पारम्परिक जल संग्रहण स्त्रोत ‘टांकों’ का ढ़ांचा यथावत रखा जावे - पूर्व सांसद चौधरी
बाड़मेर
पारम्परिक जल संग्रहण स्त्रोत ‘टांका’ के निर्माण आकार में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाये। इस संबंध में एआईसीसी सचिव एवं पूर्व सांसद हरीश चौधरी ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव से जयपुर में मुलाकात कर अवगत कराया कि दुनिया में पश्चिमी राजस्थान में बने टांकों ने एक आदर्श स्थापित किया हुआ है, टांकों के माध्यम से वर्षा जल का संचय किया जाकर इनका अधिकतम उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा जल स्वावलम्बन व अन्य योजनाओं में जल स्त्रोतों के निर्माण प्रोत्साहन के लिए करोड़ों रूपये व्यय किये जा रहे हैं। पश्चिमी राजस्थान में समाज इन पारम्परिक टांकों को स्वीकार कर रहा है, तो सरकार को इस ओर ज्यादा मदद करनी चाहिए।
पूर्व सांसद हरीश चौधरी ने कहा कि कुछ दिनों से चर्चा है कि टांकों का आकार या लागत कम की जाये। उन्होनंे कहा कि विभाग अध्ययन करवाकर इस संबंध में वस्तुस्थिति का पता करे। पूर्व सांसद ने कहा कि यहां 40000 लीटर क्षमता का टांका ही व्यवहार्य है। इससे कम क्षमता के टांके वर्षा जल संचयन के लिए उपयोगी नहीं होगें। साथ ही उसकी आगोर भी आश्यक है, बिना आगोर का टांका जल संग्रहण योग्य नहीं होगा। पश्चिमी राजस्थान में वर्षा की असमानता रहती है ऐसे में बड़े टांकों में संचित जल से ग्रामीण 3-4 माह तक उस जल का उपयोग कर सकते हैं। पूर्व सांसद चौधरी ने कहा कि आज देश में विशुद्ध पानी से जो कठिनाइयों या दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं, उस स्थिति में शुद्ध पानी का एकमात्र विकल्प ये टांके ही है जिनका अधिकतम उपयोग लोग कर रहे हैं। पूर्व सांसद चौधरी ने ग्रामीण विकास सचिव से टांकों के मूल ढ़ांचे में बदलाव किये बिना चालीस हजार लीटर से अधिक क्षमता के टांकों का निर्माण करवाने के साथ ही उसमें 10.15 मीटर का आगोर व बाड़ का निर्माण करवाने का अनुरोध किया ताकि इनको उचित उपयोग हो सके व ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की समस्या के समाधान में मदद मिल सके।

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