बाड़मेर में कुपोषण से दो माह में 11 बच्चों की मौत, 16 गंभीर
बाड़मेर।
जिले में कुपोषण से पीड़ित 11 बच्चों ने पिछले दो माह में दम तोड़ दिया। इसके अलावा 16 बच्चों की हालत नाजुक है। खास बात यह है कि ये सभी बच्चे सरकार के सीएमएएम कार्यक्रम (समुदाय आधारित अति कुपोषित बच्चों के प्रबंधन) के तहत चिह्नित हैं। इस कार्यक्रम के तहत कुपोषण से ग्रस्त बच्चों का उपचार होता है। उधर, जिला प्रशासन प्रारंभिक स्तर पर इन मौतों का कारण कुपोषण मान रहा है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है।
जिम्मेदार चिकित्सा विभाग के अधिकारी भी सच छिपाने में जुटे हैं और बच्चों की मौत को लेकर अलग-अलग बीमारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। 
इनका कहना है कि किसी की मौत निमोनिया से तो किसी की एनिमिया तो किसी के दिल में छेद था। पीड़ित बच्चे चौहटन, सिवाना व बालोतरा ब्लॉक के हैं। जिले के तीन ब्लॉक के 158 गांवों के 38588 बच्चों की स्क्रीनिंग की गई थी। इसमें 1344 बच्चे कुपोषित होने की पुष्टि हुई है।
इन 11 बच्चों की मौत : 
जिले के चौहटन, सिवाना व बालोतरा ब्लॉक में पिछले दो माह में 11 बच्चों की मौतें हुई। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक पीएचसी सारला के सूजो का निवाण निवासी उगम पुत्री रमेश कुमार, कौशल्या पुत्री नखतसिंह गुमाने का तला, कविता पुत्री तुलछाराम बीजराड़, सुगणा पुत्री वीरमाराम धनाऊ, उषा पुत्री भीमाराम धनाऊ, पूजा कंवर पुत्री भंवरसिंह , मेहबूब पुत्र हनीफ खां बड़नाव जागीर, पवनी पुत्री चैनराम दूधवा,मुस्कान पुत्री अचलाराम निवासी रानीदेशीपुरा और जमना निवासी रामपुरा जसोल की मौत हो गई।
यह है कुपोषण :
छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। यह एक ऐसी दस्त और निमोनिया के रूप में आम बीमारियों से पीड़ित बच्चों में मृत्यु दर में वृद्धि से बच्चे की मौत के एक अप्रत्यक्ष कारण हो सकते हैं। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्नास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं।
क्यों हुई मौत :
1. 17 ब्लॉक और 4 लाख 34 हजार बच्चे, 3 ब्लॉक के 38500 बच्चों को तलाश पाए 
जिले में कुपोषण के शिकार बच्चों के सर्वे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। विभाग ने तीन ब्लॉक का पायलट प्रोजेक्ट में चयन कर सर्वे करवाया। जिले में 4 लाख 34 हजार 5 वर्ष तक की आयु के बच्चे है जो राजस्थान में सर्वाधिक है। विभाग ने तीन ब्लॉक के 38500 बच्चों की स्क्रीनिंग करवाई है।

2. अस्पतालों में चक्कर काटते रहे पीड़ितों के परिजन किसी ने नहीं सुनीं 
- बड़नावा जागीर में के मासूम मेहबूब की मां मखनी बताती है कि बेटा ज्यादा बीमार था। यहां से उसे जोधपुर जाने का कहा गया। जोधपुर से उसे बाड़मेर जाने का बोल दिया। वापिस बाड़मेर जाने की मेरी परिस्थिति नहीं थी, इसलिए बच्चे को घर ले आई। घर पर उसकी मौत हो गई। 
- सब्जी का ठेला चलाने वाला जसोल निवासी लालाराम बताता है कि उसकी 14 वर्षीय पुत्री जमना जब ज्यादा बीमार दिखने लगी तो उसे एक निजी अस्पताल में उपचार करवाया। वहां से राजकीय नाहटा चिकित्सालय में भेज दिया गया, जहां दो बोतल खून भी चढ़ाया, पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इस दरम्यान उसे एक पोषण किट जरूर लाकर दिया गया, मगर तब तक उसकी मौत हो गई। 
- धनाऊ के वीरमाराम ने अपनी बेटी सुगनी का एक माह तक चौहटन के निजी क्लीनिक में इलाज करवाया। कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर धनाऊ के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में इलाज शुरू करवाया।यहां दस दिन के इलाज के बाद डाक्टर ने बाड़मेर ले जाने का कहा। दूसरे दिन बाड़मेर ले जाने के लिए तैयार हो ही रहा था कि मासूम की मौत हो गई।
सरकारी से लेकर निजी सब में गया,नहीं बचा पाया बेटी :धनाऊ के ही गरीब और बीपीएल चयनित भीमाराम की डेढ़ साल की बेटी उषा का पहले स्थानीय सरकारी अस्पताल में इलाज करवाया। यहां से फिर वह सांचोर के एक निजी अस्पताल में गया। वहां सात दिन भर्ती रखने के बाद एक माह की दवाई देकर छुट्टी दे दी। वापिस आने का कहा,लेकिन पास में रुपए नहीं होने के कारण जा नहीं पाया और कुछ दिन बाद उषा की मौत हो गई। 
फैक्ट फाइल
ब्लॉक बच्चों की मौत रेफर करने लायक इतनों के स्वास्थ्य में सुधार 
चौहटन 5 12 305 
सिवाना 2 2 96 
बालोतरा 4 2 225 
नोट: शेष बच्चों की सेहत में सुधार के बाद छुट्टी दी गई।
देश में हर साल दस लाख मौतें
राजस्थान के बारां और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक नई स्टडी से पता चला है कि देश के गरीब इलाकों में बच्चे ऐसी मौत का शिकार होते हैं जिसको रोका जा सकता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुपोषण के कारण 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुपोषण को मेडिकल इमर्जेंसी करार दिया जाए। उनका कहना है कि ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और अति कुपोषण के लिए इमर्जेंसी सीमा से ऊपर है।


अब मौतें बुखार और निमोनिया से होना बता रहे
-कालाथल गांव में पूजा कंवर पुत्री गबरसिंह ने गत 16 फरवरी को आखिरी सांस ली। चिकित्सा विभाग मौत का कारण लकवा व बुखार बता रहा है। 
-बड़नावा जागीर के मेहबूब पुत्र हनीफ खान ने 6 फरवरी को कुपोषण से दम तोड़ दिया। विभाग ने मौत का कारण एनीमिया बताया है। 
-दूदवा डेर के मासूम पवन पुत्र चैनाराम की 9 फरवरी को मृत्यु हुई। अति कुपोषित इस बच्चे की मौत का कारण विभाग ने हृदय में छेद होना बताया है। 
-जसोल के नयापुरा में रहने वाले लालराम की 14 माह की जमना कुपोषित थी। इसकी मौत का कारण भी चिकित्सा विभाग ने निमोनिया माना है। 
-मुस्कान पुत्री अचलाराम मेघवाल रातडी गांव की निवासी थी। इसका इलाज खंडप सीएचसी के अधीन चल रहा था। मौत का कारण बुखार बताया है।
ये कहते हैं जिम्मेदार
मामले में प्रथम दृष्टया कुपोषण होने की पुष्टि हुई है। साथ ही ऑन रिकार्ड अन्य बीमारी से ग्रसित होना सामने अाया है। जांच के आदेश दिए हैं। मेडिकल टीम की रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ बता पाएंगे। 
-सुधीर शर्मा, कलेक्टर


बाड़मेर में कुपोषण से 11 बच्चों की मौतें नहीं हुई है। इसकी वजह विभिन्न बीमारियां रही है। सामुदायिक आधार पर अति कुपोषित का प्रबंधन के तहत जिले के तीन ब्लॉक का चयन किया गया है।
-नवीन जैन, एमडी, स्वास्थ्य विभाग, जयपुर।

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