"झुम्पा" , दो भाषा और दो देशों की बीच

"झुम्पा" , दो भाषा और दो देशों की बीच
जयपुर।  
भारतीय अमेरिकी लेखिका झुम्पा लाहिड़ी ने इन दिनों लेखन की दुनिया में सुर्खियों का ताज पहनकर चर्चित हैं, जयपुर लिटरेटर फेस्टिवल के दूसरे दिन डिग्गी पैलेस का नजारे में झुम्पा की झलक देखने को हर कोई बेताब था, दोपहर बाद झुम्पा के "इंटरप्रेटर ऑफ स्टोरीज" वाले सेशन के लिए फ्रंट लॉन इस कदर भरा चुका था कि जैसे पुलित्जर पुरस्कार विजेता झुम्पा को देख और सुनने से दिल और दिमाग को तसल्ली मिल जाएगी, और हुआ भी ऎसा ही, फ्रंट लॉन में जितने लोग कुर्सियों पर बैठे, लगभग उतने ही लोगों खड़े होकर झुम्पा को मग्न होकर सुना।

दो भाषा, दो देश

रूपलीना बोस के साथ जब झुम्पा फ्रंट लॉन के मंच पर पहुंची, तो यह लेखिका हजारों लोग को सामने बैठा देखकर थोड़े देर के लिए आश्चर्य में जरूर में पड़ गईं, यह सब देखकर झुम्पा को अहसास हुआ होगा कि मेरा लेखन, मुझे लोकप्रियता के पायदान में लगातार आगे बढ़ा रहा है।

नागरिकता को लेकर झुम्पा ने कहा कि मैं दो देशों के बीच उलझती रहती हूं, यह निश्चय नहीं कर पाती हूं कि मैं पूरी अमरीकी हूं, या भारतीय, क्योंकि मेरा इन दोनों देशों से गहरा नाता है, रहती अमरीका में हूं। उन्होंने कहा कि अंग्रजी और बंगाली भाषाओं के बीच भी में उलझती रहती हूं, क्योंकि मेरा इन दोनों भाषाओं से रिश्ता है, जिनमें से एक तो मेरी पुश्तैनी है और दूसरी जिसके बीच मैं पली बढ़ी और आज हूं। 

झुम्पा ने खुद की जिंदगी और लेखन को लेकर कुछ ऎसे पहलुओं पर बोला, जिनसे बहुत लोग पहली बार वाकिफ हुए, 46 साल की इस उपन्यासकार ने कहा कि मैं कम लिखने में विश्वास रखती हूं, मैं जो लिखती हूं उसमें पश्चिमी बंगाल और कलकत्ता की झलक ज्यादातर रहती है, मेरे उपन्यास के पात्र कुछ असल जिंदगी के और कुछ कल्पनाशील भी रहते हैं, जिनमें बंगाली झलक भी बनी रहती है।

मां- बाप ने छोड़ा देश

झुम्पा ने अपने परिवार के बार में बताया कि 1962 में मेरे पिता और 1966 में मेरी मां ने भारत छोड़कर लंदन चले गए थे, कुछ समय के बाद अमरीका को अपना घर बना लिया, जो आज भी है। लंदन में जन्मी झुम्पा ने बताया कि मैं इन दिनों एक नॉन फिक्शन किताब लिख रही हूं। "टू ब्रदर उपन्यास" को लेकर जब झुम्पा से सवाल किया कि आपका कोई भाई नहीं है, तो जवाब ने इस लेखिका ने कहा कि नहीं, मेरी एक छोटी बहिन है, मेरा शुरूआती समय में अकेलापन बहुत रहा ।


मिला पुलित्जर

1999 में "इंटरप्रेटर ऑफ मैलडीज" उपन्यास लिखने वाली झुम्पा 2000 में पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानिज होकर साहित्य की दुनिया का बड़ा नाम बन गई। और 2013 में लिखी किताब "द लॉलैंड" बुकर प्राइज के लिए नामांकित होने के बाद झुम्पा दुनिया के नक्शे पर बड़े उपन्यासकार के तौर पर उभरकर आईं, बंगाली परिवार से ताल्लक रखने वाली इस लेखिका को बचपन में नीलांजना सुदेश्ना नाम रखा गया, बाद में इनको उपनाम झुम्पा से पुकारा जाने लगा।

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