जीवन में अर्थ और काम की तिलांजलि आवश्यक है- साध्वी प्रियरंजनाश्री
बाड़मेर। 
थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में साध्वीवर्या प्रियरंजनाश्री म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि दीपावली लोकोत्तर पर्व है। कर्म के अंधन से छूटने के लिए जैन शासन में दीपावली लोकोत्तर पर्व है। इस पर्व के साथ जप-तप की साधना जुड़ी हुई है। अच्छा खाना-पीना, अच्छे कपड़े पहनना और मौज-मजा करना यह लौकिक पर्व का उद्देश्य है, जबकि लोकोत्तर पर्व हमें त्याग और वैराग्य का संदेश सुनाते हैं। ऐसे महान् पर्व के शुभ दिन कई अज्ञानी लोग पटाखे आदि फोड़कर भयंकर पाप कर्म का बंध करते हैं।
साध्वी श्री ने कहा कि महावीर प्रभु ने अपनी देशना में कहा कि इस संसार में जीवात्मा के चार प्रकार के पुरूषार्थ प्रसिद्ध हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में चार पुरूषार्थ कहलाते हैं। परन्तु इन चारों में अर्थ और काम तो नाम के ही पुरूषार्थ हैं। परिणामस्वरूप तो वे अर्थ को ही पैदा करने वाले हैं।
अर्थ अर्थात् धन और काम अर्थात् पांचों इन्द्रियों के विषय भोग। अनादिकाल से आत्मा में अर्थ अर्थात् धन की तथा काम अर्थात् मैथुन की संज्ञाएं रही हुई हैं। एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के हर भव में जीवात्मा को स्पर्शेन्द्रिय अवश्य प्राप्त हुई है। इस स्पर्शेन्द्रिय के सुख की आसक्ति हर आत्मा को हर भव में रही हुई है।
मनुष्य भव में आहार आदि चारों संज्ञाएं होती हैं, फिर भी मैथुन संज्ञा का खूब जोर होता है। अर्थ और काम ये दोनों आत्मा को संसार में भटकाने वाले हैं। आत्मा को अपने स्वरूप में रमण करने के लिए न धन की आवश्यकता रहती है न काम की। अर्थ और काम ये दोनों आत्मा की विभाव दशाएं हैं। अर्थ और काम दोनों आत्मा से भिन्न हैं। आत्मा के विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त करने के लिए तारक महावीर प्रभु ने अर्थ और काम को त्याज्य पुरूषार्थ के रूप में गिना है। देवों को भी दुर्लभ ऐसे मानव जन्म को सफल और सार्थक बनाना हो तो इस जीवन में अर्थ और काम को सर्वथा तिलांजलि दे दो।

एक मात्र मोक्ष ही सच्चा और वास्तविक पुरूषार्थ है क्योंकि मोक्ष में ही जीवात्मा की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है। जीवात्मा की सबसे पहली इच्छा जीने की है। क्योंकि सदाकाल जीवन जीने की इच्छा होने पर भी संसारी जीव को बार-बार मरना ही पड़ता है। जीने की लाख इच्छा होते हुए भी आयुष्य पूर्ण होते ही अपनी देह छोड़नी पड़ती है। जीवात्मा की दूसरी इच्छा सुख प्राप्ति की है। संसार में सभी जीवों की इच्छा सुख पाने की है परन्तु संसार में जीवात्मा की यह इच्छापूर्ति होती नहीं है। संसार में सुख का नामोनिशान नहीं है और दुःख का पार नहीं है। सारा संसार दुःखों से भरा हुआ है, जबकि मोक्ष में दुःख कलेश भी नहीं है, मोक्ष अनंत सुखों से भरपूर है।

साध्वी डाॅ. दिव्यांजनाश्री ने कहा कि जीवात्मा की तीसरी इच्छा स्वतंत्र रहने की है। हर आत्मा को स्वतंत्रता पसंद है। बंधन या गुलामी किसी को पसंद नहीं है। संसार में सर्वत्र पराधीनता है। बंधन मुक्त का नाम ही मोक्ष है। जीवात्मा की चैथी इच्छा ज्ञान प्राप्ति की है। जीव मात्रा में ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा रही होती है। परन्तु सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति केवल ज्ञान की प्राप्ति के बाद ही होती है। मुक्तात्मा मंे केवल ज्ञान होता है। अज्ञानता के कारण ही संसारी जीव जहां-तहां दुःख पाता है।

खरतरगच्छ जैन श्री संघ के अध्यक्ष मांगीलाल मालू व उपाध्यक्ष भूरचन्द संखलेचा ने बताया कि कल शाम छः बजे मां सरस्वती का जप अनुष्ठान रहेगा। आज से परमात्मा महावीर की अंतिम वाली रूप देशना उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन प्रारम्भ हो गया है।

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