फेसबुक ने 11 साल बाद भाईयों को मिलाया 
पुणे।
इनकी कहानी अनूठी हिंदी मूवी जैसी है। जिसमें दो भाई बचपन में जुदा हो जाते हैं और 11 साल बाद मिलते हैं। 22 साल के संतोष डोमाले और 24 साल के अंकुश डोमाले की जिंदगी में कोई विलेन नहीं था। 
संतोष मॉर्डन कॉलेज में बी कॉम का स्टूडेंट है। अंकुश उस समय घर से चला गया था जब वह 13 साल का था। संतोष ज्यादातर वक्त फेसबुक पर बिताता था। इस कारण उसे मां की डांट भी खानी पड़ती है। एक रात 1 बजे उसके सेलफोन ने बिप किया। उसकी फेसबुक प्रोफाइल पर मराठी में मैसेज था। मैसेज में लिखा था मैं तुम्हारा भाई हूं। मुझे कॉल करो। संतोष ने फोन किया तो सामने उसका भाई अंकुश था। 
संतोष ने बताया कि जब मैंने फेसबुक प्रोफाइल पर फोटो देखा तो पहचान नहीं पाया क्योंकि उसके सिर पर पगड़ी थी। वह सरदार की तरह लग रहा था। मैंने अपनी मां को उठाया और उन्हें फोटो दिखाया। मैंने पूछा कि क्या आप इसको पहचान सकती हैं। उन्होंने बताया कि यह तो तुम्हारा भाई अंकुश है। मां हेमलता ने आंखों की पुतलियों के पास और गाल पर चोट के निशान देखकर अंकुश को पहचाना। 
कोई मां अपने पहले बच्चे को कैसे नहीं पहचान सकती। जब अंकुश 11 साल का और संतोष नौ साल का था तब उनके पिता का देहांत हो गया था। बकौल अंकुश पिता के देहांत के बाद मैं गलत संगत में पड़ गया था। मैं दोस्तों के साथ रात-रात भूर घूमता रहता था। मैं घर से ज्यादा से ज्यादा वक्त तक दूर रहना चाहता था। जब वह 13 साल का था तो उसने अपने चाचा की बाइक उठाई और उसे दूसरे वाहन से भिड़ा दिया। इससे बाइक क्षतिग्रस्त हो गई। बकौल अंकुश जब मैं घर लौटा तो चाचा ने बहुत पीटा और मां को शिकायत कर दी। 
उन्होंने भी मुझे बुरी तरह डांटा और पीटा। गुस्से में मां ने मेरे मुंह पर 50 रूपए का नोट फेंका और कहा कि घर छोड़कर चला जा। मैं घर छोड़कर चला गया। 50 रूपए में मैंने वड़ा पाव खाया। मैंने एक सिख ट्रक ड्राइवर को अपनी कहानी सुनाई। वह मुंबई से नांदेड़ माल पहुंचाता था। ड्राइवर ने मुझे अपने साथ चलने को कहा। मैंने उसके साथ पंजाब जाने से मना कर दिया। उसने मुझे नांदेड़ में एक गुरूद्वारे में छोड़ दिया। अंकुश गुरूद्वारे के लंगर में सेवा करने लगा। इस दौरान वह एक बाबा के संपर्क में आया। 
6 महीने में मैंने बाबा से सारा काम सीख लिया। 2013 में लुधियाना के गुरूद्वारे से आए एक अन्य बाबा मेजर सिंह ने मुझे काम करते हुए देखा। बाबा मेरे काम से प्रभावित हो गया और वह मुझे लुधियाना ले गया। मैं सिख बन गया और अपना नाम गुरूबाज सिंह रख लिया। अंकुश लोगों की ओर से दान में दिए जाने वाले गेंहूं को गुरूद्वारे लाता। बाबा ने अंकुश को ड्राइविंग सिखाई और लाइसेंस भी बनवा दिया।
21 जुलाई की रात उसका एक साथी से झगड़ा हो गया। उस वक्त अंकुश को अपने भाई संतोष की याद आई जिससे वह हमेशा लड़ा करता था। मैंने उसे फेसबुक पर ढूंढा और वह मिल भी गया। मैंने संतोष को अपने फोन नंबर मैसेज किए। इसके बाद उसने मुझे फोन किया। दोनों भाईयों ने करीब दो घंटे तक बात की। बाबा ने झेलम एक्सप्रेस में अंकुश का टिकट करवाया और वह 28 जुलाई को पुणे के रेलवे स्टेशन पहुंचा।

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