कैसे भरेंगे 20 अक्टूबर 1962 के घाव 

नई दिल्ली। 
हिमालय की गगनचुम्बी चोटियों के बीच 20 अक्टूबर 1962 के पहले पहर में उगते सूरज के साथ ही चीन की लालसेना ने पूर्वोत्तर भारत के नेफा में भारतीय चौकियों पर धावा बोल दिया और प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का भारत-चीनी भाई-भाई का नारा दु:स्वप्न में बदल गया। इस एकतरफा युद्ध से भारतीय जनमानस पर हुए आघात की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति स्वर साम्राज्ञी लता मंगेश्वर के "ऎ मेरे वतन के लोगों,जरा आंख में भर लो पानी.." गीत में हुई जिसे सुनकर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। पिछले 50 वर्षो के दौरान गंगा और ब्रह्मपुत्र में काफी जल प्रवाह हो चुका है तथा भारत-चीन युद्ध की इस बरसी पर दोनों देश इस वर्ष की मैत्री और सहयोग के वर्ष के रूप में मना रहे हैं। आधी सदी में भारतीय फौज भी पहली बार शुक्रवार को अमर जवान ज्योति पर अपने उन शहीदों को नमन कर रही है जिन्होंने 62 की जंग में प्राण गंवाए थे।

चीन युद्ध का सच क्यों नहीं आता सामने
1962 के युद्ध को 50 साल हो गए लेकिन देश की जनता को इस बात की जानकारी नहीं है कि उसके साथ युद्ध क्यों व किन परिस्थितियों में हुआ। दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ यदि पत्ता भी हिलता है तो देश का बच्चा-बच्चा जान जाता है कि क्या हुआ। एंडरसन समिति ने भारत-चीन युद्ध पर रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन इस युद्ध के 50 साल बाद भी यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है न ही आज तक किसी को यह पता चल सका है कि इस युद्ध में हमने क्या खोया और क्या पाया। केजीबी और सीआईए भी 20 सालों में अपनी किसी जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक कर देते हैं लेकिन आज तक एंडरसन समिति की रिपोर्ट क्यों सार्वजनिक नहीं हुई यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

देश की जनता अब भी आशंकित
हार के कारणों पर भूतपूर्व जनरलों, रक्षाविशेषज्ञों, राजनयिकों और इतिहासकारों ने सैकड़ों पुस्तकें और आलेख लिखे हैं। भारत के लिए महत्वपूर्ण सबक यह रहा कि वह पड़ोसियों के साथ दोस्ती की आशा रखते समय हकीकत को नजरअंदाज नहीं करे। युद्ध की 50वीं बरसी पर रक्षा मंत्री एके एंटनी और सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह देशवासियों को यह भरोसा दिला रहे हैं कि सन् 1962 की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाएगी। हिमालय के आरपार के एशिया के ये दो महान देश भी एक साझा भविष्य की तलाश में हैं तथा तीन हजार किलोमीटर से अधिक लम्बी सीमा पर दशकों से एक भी गोली नहीं चली। 


चीन कर रहा विश्वास बहाली की बात

बीजिंग में चीन के अधिकारी भी भारत के साथ विश्वासघात की बात को भुला देना चाहते हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली से जब इस बरसी के बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने कहा राष्ट्रपति हू जिनताओ और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त रूप से इस वर्ष को भारत चीन मित्रता एवं सहयोग वर्ष के रूप में मनाने का फैसला किया है। युद्ध का कारण बने सीमा विवाद के बारे में चीनी प्रवक्ता का कहना था कि यह समस्या हमें विरासत में मिली है तथा दोनों पक्ष एक उचित न्यायसंगत और दोनों को स्वीकार्य समाधान खोजने के प्रति प्रयासरत हैं। दोनों देशों की ओर से आज व्यक्त की जा रही इस सदभावना के ठीक विपरीत 50 वर्ष पहले अक्टूबर का महीना आपसी अविश्वास और कटुता की चरमसीमा साबित हुआ तथा पं. नेहरू का कूटनीतिक कौशल देश को एक शर्मनाक हार से नहीं बचा पाया।

नेहरू के आदेश पर बौखलाया था चीन

युद्ध का पहला सीधा संकेत 12 अक्टूबर 1962 को सामने आया जब पं. नेहरू ने श्रीलंका की यात्रा पर जाते हुए कहा कि भारतीय सेना को आदेश दिया गया है कि वह पूर्वोत्तर भारत के अपने पूरे भू.भाग पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराए। चीन के शीर्ष नेताओं माओत्से तुंग और चाऊ एन लार्ड ने इस घोषणा को अपने देश के खिलाफ जंग का एलान करार दिया। 20 अक्टूबर को चीन की लाल सेना के हजारों सैनिकों ने टिड्डी दल की तरह भारत की सीमा चौकियों पर हमला बोल दिया। हमला केवल नेफा तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि करीब 3000 किलोमीटर लम्बी सीमा के कई संवेदनशील क्षेत्रों में चीन ने घुसपैठ शुरू कर दी। एक महीने के बाद 19 नवंबर को चीन ने युद्ध विराम की घोषणा की।

हमने खोए 7000 से ज्यादा जवान

इस हमले में भारतीय सेना आक्रमणकारियों को अपने क्षेत्र में काफी अंदर तक घुस आने से नहीं रोक पाई। कुछ रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस युद्ध में भारत को युद्धबंदियों सहित सात हजार जवानों का नुकसान उठाना पड़ा। भारत-चीनी भाई-भाई का मंत्र जाप करने वाले पं. नेहरू के लिए पड़ोसी देश का विश्वाघात एक व्यक्तिगत आघात भी सिद्ध हुआ। हालांकि इस पराजय का सबसे अधिक दोष तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन पद मढ़ा गया। 31 अक्टूबर को मेनन ने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और यह मंत्रालय पं. नेहरू ने अपने पास रख लिया।

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