... जहाँ हिलोरें लेती हैं लोक लहरियाँ
इस बार अधिक मास होने के कारण दो भादाें मास माने गए। इस बार 628 वां भादवा मेला 17 सितम्बर से परवान पर है तथा यह बाबा की निर्वाण तिथि भाद्रपद शुक्ल ग्यारस, 26 सितम्बर तक चलेगा। श्रद्धालुओं का सैलाब इस दफा पिछले भादवा महीने से ही उमड़ रहा है, जो शुक्ल पक्ष की एकादशी तक जारी रहेगा। यह विशाल मेला देश की सर्वाधिक लम्बी अवधि तक चलने वाला एक मात्र मेला है।
राजस्थान के लोक मेले एक ओर जहाँ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक वैभव के परिचायक हैं, वहीं सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक भी हैं। जैसलमेर जिले के पोकरण उपखण्ड मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर बीकानेर मार्ग पर स्थित रामदेवरा गांव बाबा रामदेव की कर्म भूमि और तपो भूमि रही है।
छब्बीस सितम्बर तक चलेगा मेला
इस बार अधिक मास होने के कारण दो भादाें मास माने गए। इस बार 628 वां भादवा मेला 17 सितम्बर से परवान पर है तथा यह बाबा की निर्वाण तिथि भाद्रपद शुक्ल ग्यारस, 26 सितम्बर तक चलेगा। श्रद्धालुओं का सैलाब इस दफा पिछले भादवा महीने से ही उमड़ रहा है, जो शुक्ल पक्ष की एकादशी तक जारी रहेगा। यह विशाल मेला देश की सर्वाधिक लम्बी अवधि तक चलने वाला एक मात्र मेला है।
सामाजिक सद्भाव का पैगाम देता है रामदेवरा
बाबा रामदेव जी का मेला एक भव्य ऎतिहासिक एवं सांस्कृतिक एकता तथा साम्प्रदायिक सद्भावना का जीता-जागता उदाहरण है। इस मेले में देश के विभिन्न प्रान्ताें से अमीर-गरीब, हिन्दू-मुसलमान व सभी धमार्ें के लोग बिना किसी भेद भाव के इस मरु भूमि में स्थित बाबा की पावन धरती पर अपने दुःख-दर्द निवारण के लिए यहां आते हैं।
भारतीय धर्म निरपेक्षता व सामाजिक समानता का अगर कोई प्रतीक है तो वह है बाबा रामदेव का मेला। इस मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा की समाधि पर पहुंच कर श्रृद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। मेले की सबसे बड़ी विशेषता की यह है कि इसमे सभी धमार्ें, समुदायों और वगोर्ं के लोग शामिल होते हैं। इनमे पिछडे़, दलित एवं कमजोर वर्ग के लोगाें की तादाद सर्वाधिक होती है।
भगवान द्वारिकाधीश का अंशावतार मानते हैं
बाबा रामदेव का पूरा जीवन सर्वधर्म समभाव और पिछड़े तथा दलिताें की सेवा में समर्पित रहा। अधिकांश भक्त तो बाबा रामदेव को जगत का कल्याण करने वाले द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का ही अंशावतार मानते हैं। राजस्थान के लोक देवताओं में बाबा रामदेव का प्रमुख स्थान है। तंवर क्षत्रिय वंश से सम्बद्ध बाबा रामदेव दिल्ली के सम्राट अनंगपाल के वंशज थे। उनका जन्म भादवा शुक्ला द्वितीया संवत् 1409 को बाड़मेर जिले के उण्डू गाँव में ठाकुर अजमाल जी के घर हुआ। इनकी माता का नाम मैणादे और ज्येष्ठ भ्राता का नाम वीरमदेव था जिनके नाम पर रामदेवरा के पास ही वीरमदेवरा गांव भी बसा है।
चमत्कारों से भरा रहा है बाबा रामदेव का जीवन
रामदेव जी ने बचपन में ही अपनी चमत्कारिक घटनाएं दिखाना प्रारम्भ कर दिया था। भैरू राक्षस को मारने के पश्चात् जब अजमाल जी रामदेवरा में बस गए, तब कई विलक्षण घटनाओं ने सभी को चकित कर दिया। एक बार बालक रामदेव अपने घर के पालने में सो रहे थे तभी अचानक चूल्हे पर पड़ा गर्म दूध उफनने लगा जिसे देख कर माता मैणादे दूध उतारने दौड़ पडी किन्तु तत्काल उसी समय रामदेव ने पहला पर्चा देते हुए उफनते दूध को उतार दिया। मैणादे अपने पुत्र के इस चमत्कार से आश्चर्यचकित हो गई। इसी प्रकार बाबा रामदेव ने अपने जीवन काल में 24 चमत्कार दिखाये थे।
आरोग्य और बरकत देता है रामसरोवर
विक्रम संवत 1439 में बाबा रामदेवरा ने एक तालाब खुदवाया था। जो आज उनके नाम से रामसरोवर कहलाता है। इस सरोवर का अपना अलग ही आध्यात्मिक महत्त्व है। लोग दर्शनोंपरान्त इसमे स्नान कर अपने को सौभाग्यशाली मानते हैं। पाल के उत्तरी सिरे पर बाबा रामदेव जी की जीवित समाधि है, जिसे अब विशाल मन्दिर का स्वरूप दे दिया गया है।
दूर से ही आकर्षण बिखेरता है भव्य धाम
आज यह मन्दिर रंग-बिरंगी ध्वजाओं के कारण श्रृद्धालुओं का ध्यान बरबस अपनी और खिंच लेता है। मन्दिर में बाबा रामदेव की समाधि बनी हुई है जिसके दोनों तरफ मस्तक बने हुए हैं। सामान्य दिनों में एक मस्तक पर चांदी का मुकुट सुसज्जित रहता है, किन्तु मेला अवधि में इसके दोनों मस्तकों पर स्वर्ण मुकुट प्रतिष्ठापित किये जाकर पूजा-अर्चना की जाती है। बाबा की समाधि के पास ही उनके पिता अजमल जी, माता मैणादे, पत्नी राणी नेतलदे, प्रिय शिष्या डाली बाई तथा अन्य परिजनों की समाधियां बनी हुई हैं। रोजाना इनकी विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।
पताकाएं और कपड़े के घोड़े चढ़ते हैं
रामदेव बाबा लाखों श्रृ़द्धालुओं के पूज्य देव हैं। भक्त लोग उनकी समाधि पर रुपया-पैसा, नारियल, मखाना, मिश्री, पताशा, मिठाई एवं चूरमा बड़ी श्रृद्धा के साथ चढ़ाते हैं। इसी तरह भक्तजन रंग-बिरंगी झण्डियां तथा कपड़े के घोड़े भी चढाते हैं। मन्दिर में सवेरे-शाम मंगला आरती होती है इस अवसर पर नगाड़ों, झालर, टंकारों एवं घण्टियों के नादों पर आस-पास का वातावरण संगीत से गूंज उठता है।
उमड़ता है पदयात्रियों का रेला
इस मेले में हजारों मेलार्थी पैदलयात्री के रूप में बीकानेर, जोधपुर, पाली, नागौर, दिल्ली महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों से पैदल चलकर रामदेवरा पहुंचते हैं। हजारों की संख्या में भक्तगण कनक दण्डवत शीश नवातेे हुए अपने आराध्य देव के दर्शन कर स्वयं को धन्य समझते हैं।
महिलाएँ बाबा के भजन गाती हुई प्रसाद की थाली हाथों में लिए लम्बी कतार में घण्टों इन्तजार करते हुए अत्यन्त उल्लासमय वातावरण में समाधि के दर्शन करती हैं। इसी प्रकार पुरुष भी बाबा की जय बोलते हुए उनके दर्शनार्थ अपनी बारी का इन्तजार करते हैं।
नवदम्पत्ति पाते हैं यहां वरदान
इस मेले में नवदम्पत्ति युगल बाबा की समाधि पर पल्ला बाँध कर जात देते हैं तथा अपने सुखमय, समृद्धिशाली एवं मंगलमय दाम्पत्य जीवन की कामना करते हैं, वहीं पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में भक्तगण यहां उनका झरूला बड़ा करते हैं। मेले में मुस्लिम समुदाय के मुरीद भी रामसापीर की समाधि पर इबादत करने पहुचते हैं।
मेला अवधि में मंदिर प्रांगण जयकारों से गुंजायमान रहता है। भक्तजनों के लिए शीतल जल, ठहरने एवं भोजन की व्यवस्था स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा निःशुल्क एवं अत्यन्त रियायती दरों पर की जाती हैं।
भजनों और वाणियों से गूंज उठता है बाबा का धाम
मेला अवधि में जगह-जगह भजन मण्डलियां बाबा के हरजस गाकर वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर देती हैं। मेलार्थियों के मनोरंजन हेतु ग्राम पंचायत रामदेवरा के द्वारा जिले के ख्यातनाम कलाकारों द्वारा प्रतिवर्ष एक भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन भी किया जाता है। मेले में यहां विभिन्न प्रकार की दुकानें लगती हैं, जहां मेलार्थी अपने पसन्द की वस्तुओं की बड़े चाव से खरीदारी करते हैं।
गुरुद्वारा व पर्चा बावड़ी हैं दर्शनीय
यहां रामदेव जी ने गुरु बालिनाथ का गुरूद्वारा बनाया जो आज रामदेवरा का मुख्य दर्शनीय स्थल एवं आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहीं पर पर्चा बावड़ी का निर्माण मावा गाँव निवासी बिहारीदास पालीवाल द्वारा जन साधारण की सुविधा हेतु करवाया । इस बावड़ी का जल अत्यन्त पवित्र एवं मीठा तो है ही, लोग इसे पवित्र जल के रूप में बर्तनों में भरकर ले जाते हैं। पुरातत्व महत्त्व की इस पर्चा बावड़ी की शिल्पकला बेजोड़ है।
बाबा रामदेव द्वारा पूरी दुनिया को दिया गया कौमी एकता, भाईचारे, छुआछूत मिटाने एवं सामाजिकता, समरसता का संदेश आज भी प्रांसगिक है। उनके आदर्शो व उपदेशों को अपनाकर सामाजिक नवनिर्माण को नई गति दी जा सकती है।
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें