विलासराव देशमुख के अंतिम दर्शन के लिए जुटे 3 लाख से अधिक लोग, हालात बेकाबू
नई दिल्ली. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख का उनके पैतृक गांव में अब से थोड़ी देर बार अंतिम संस्कार किया जाएगा। अपने लोकप्रिय नेता के अंतिम दर्शन के लिए लातूर में तीन लाख से ज्यादा लोग जमा हो गए हैं। हालात बेकाबू होने के बाद पुलिस को लाठियां भांजने पर भी मजबूर होना पड़ा। देशमुख को श्रद्धांजलि देने और शोक संतप्त परिजनों के प्रति सहानुभूति जताने के लिए हस्तियों का तांता लगा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देशमुख को अंतिम विदाई देने के लिए लातूर पहुंच गए हैं। महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हाण, डिप्टी सीएम अजित पवार समेत कई बड़े नेता भी लातूर पहुंचे हैं।
लंबे समय से बीमार चल रहे देशमुख का मंगलवार को चेन्नई के एक अस्पताल में निधन हो गया। बीते सात अगस्त से वह इस अस्पताल में भर्ती थे। देशमुख का लीवर और किडनी खराब था। उनके ये दोनों ही अंग ट्रांस्प्लांट होने थे। इसके लिए एक डोनर भी मिल गया था, लेकिन अंग दान करने से पहले ही डोनर की मौत हो गई। देशमुख का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने कहा 'सभी राज्य सरकारें मदद करना चाह रहीं थी लेकिन हमें वक्त पर डोनर नहीं मिल पाया। मंगलावार को भी तीन ऑफर आए लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।'
नई दिल्ली. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख का उनके पैतृक गांव में अब से थोड़ी देर बार अंतिम संस्कार किया जाएगा। अपने लोकप्रिय नेता के अंतिम दर्शन के लिए लातूर में तीन लाख से ज्यादा लोग जमा हो गए हैं। हालात बेकाबू होने के बाद पुलिस को लाठियां भांजने पर भी मजबूर होना पड़ा। देशमुख को श्रद्धांजलि देने और शोक संतप्त परिजनों के प्रति सहानुभूति जताने के लिए हस्तियों का तांता लगा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देशमुख को अंतिम विदाई देने के लिए लातूर पहुंच गए हैं। महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हाण, डिप्टी सीएम अजित पवार समेत कई बड़े नेता भी लातूर पहुंचे हैं।
लंबे समय से बीमार चल रहे देशमुख का मंगलवार को चेन्नई के एक अस्पताल में निधन हो गया। बीते सात अगस्त से वह इस अस्पताल में भर्ती थे। देशमुख का लीवर और किडनी खराब था। उनके ये दोनों ही अंग ट्रांस्प्लांट होने थे। इसके लिए एक डोनर भी मिल गया था, लेकिन अंग दान करने से पहले ही डोनर की मौत हो गई। देशमुख का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने कहा 'सभी राज्य सरकारें मदद करना चाह रहीं थी लेकिन हमें वक्त पर डोनर नहीं मिल पाया। मंगलावार को भी तीन ऑफर आए लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।'मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में नेता सदन सुशील कुमार शिंदे ने देशमुख के निधन की घोषणा की। इसके बाद संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित कर दी गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने देशमुख के असामयिक निधन पर शोक व्यक्त किया है।
देशमुख के निधन के बाद अब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर होने वाले सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं। प्रधानमंत्री लाल किले पर झंडा फहराएंगे, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा।
67 साल के देशमुख की तबीयत काफी समय से खराब थी। 7 अगस्त को उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई। तब उन्हें आनन फानन में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल से एयर एंबुलेंस के जरिए चेन्नई ले जाया गया था। वहां उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था।विलासराव देशमुख और उनकी पत्नी वैशाली देशमुख के तीन बेटे हैं- अमित देशमुख, रितेश देशमुख और धीरज देशमुख। अमित देशमुख लातूर से विधायक हैं। रितेश देशमुख जानेमाने बॉलीवुड अभिनेता हैं। विलासराव देशमुख का जन्म 26 मई 1945 को लातूर जिले के बाभालगांव के एक मराठा परिवार में हुआ था। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में स्नातक की पढ़ाई की। पुणे के ही इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। विलासराव ने युवावस्था में ही समाजसेवा शुरू कर दी थी। उन्होंने सूखा राहत जैसे सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। 8 साल तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे देशमुख की राजनीतिक पारी बतौर सरपंच शुरू हुई थी। 1974 में वह बाभलगांव के सरपंच बने। उसके बाद पंचायत समिति के सभापति, फिर जिला परिषद के अध्यक्ष बने। उन दिनों विलासराव युवक कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।विलासराव अपने कार्यकाल के दौरान युवा कांग्रेस के पंचसूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने की दिशा में भी काम किया। विलासराव के पिता दगडोजीराव भी सरपंच थे। वह भी कट्टर कांग्रेसी थे। विलासराव के कांग्रेस से जुड़ने का एक कारण यह भी था। विलासराव का स्वभाव राजनीति के ही लायक था। वह सबके साथ सहजता से घुल-मिल जाते थे। अपने स्वभाव और काबिलियत के चलते वह सभी के चहेते बनते चले गए। विलासराव महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा नाम था। वह महाराष्ट्र के राजनीति में कांग्रेस के सबसे अहम सिपहसलार माने जाते रहे। मुंबई में आज शायद ही कोई ऐसा बड़ा व्यावसायिक घराना होगा जिसके संबंध विलासराव देशमुख से अच्छे नहीं थे। कांग्रेस पार्टी के हमेशा से बड़े व्यावसायिक घरानों से बेहतर ताल्लुकात रहे हैं और शरद पवार को इसका सूत्रधार माना जाता था। लेकिन शरद पवार के कांग्रेस से निकलकर दूसरी पार्टी बनाने के तुरंत बाद विलासराव ने उनकी जगह को भरने सफलता पाई। शायद यही वजह रही कि कांग्रेस को महाराष्ट्र में औद्योगिक घरानों का समर्थन मिला और विलासराव पर भी कांग्रेस की विशेष कृपा बनी रही। 1980 में शिवराज पाटील लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, तब विलासराव को राज्य स्तर की राजनीति में मौका मिला। पाटील की जगह देशमुख को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में उम्मीवार बनाया। उसके बाद से देशमुख ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। शिवराज पाटील द्वारा खाली की गई विधानसभा सीट के जरिए महाराष्ट्र की राज्य स्तरीय राजनीति में कदम रखने के बाद देशमुख 1980 से लगातार तीन चुनावों में विधानसभा के लिए चुने गए और विभिन्न मंत्रालयों में बतौर मंत्री कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने गृह, ग्रामीण विकास, कृषि, मतस्य, पर्यटन, उद्योग, परिवहन, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, युवा मामले, खेल समेत अनेक पदों पर मंत्री के रूप में कार्य किया। 1995 में विलासराव देशमुख चुनाव हार गए लेकिन 1999 के चुनावों में उनकी विधानसभा में फिर से वापसी हुई और वो पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। लेकिन उन्हें बीच में ही मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़नी पड़ी और सुशील कुमार शिंदे को उनकी जगह मुख्यमंत्री बनाया गया। अगले चुनावों में मिली अपार सफलता के बाद कांग्रेस ने उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया। पहली बार विलासराव देशमुख 18 अक्टूबर 1999 से 16 जनवरी 2003 तक मुख्यमंत्री रहे जबकि दूसरी बार उनके मुख्यमंत्रित्व का कार्यकाल 7 सितंबर 2004 से 5 दिसंबर 2008 तक रहा। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के दूसरे कार्यकाल के दौरान मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हुआ। इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय राजनीति का रुख किया और राज्यसभा के सदस्य बने। उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई और उन्होंने भारी उद्योग व सार्वजनिक उद्यम मंत्री, पंचायती राज मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री के पद पर काम किया। अस्पताल में भर्ती होने से पहले देशमुख के पास साइंस एंड टेक्नोलॉजी मंत्रालय के साथ भू-विज्ञान मंत्रालय की जिम्मेदारी थी। अस्पताल में भर्ती होने के बाद इन मंत्रालयों का जिम्मा केंद्रीय मंत्री वायलार रवि को सौंपा गया था। विलासराव देशमुख मुंबई क्रिकेट एशोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। विलासराव की भाषण शैली भी अनोखी थी और वह लगातार इसमें निखार भी लाते गए थे। अपनी खास शैली के चलते वह पूरी सभा का दिल जीत लेते थे।उनके राजनितिक विरोधी भी उनकी इस खूबी के कायल थे। विलासराव अपने विरोधियों को बडी सफलता से मात देते थे। विलासराव का व्यक्तित्व आत्मविश्वास से भरपूर था। 2004 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान नागपुर में उनसे सवाल किया गया कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? उस पर बड़ी ही सहजता और आत्मविश्वास से उन्होंने जवाब दिया, 'कौन होगा क्या? मै ही मुख्यमंत्री हूं और मै ही मुख्यमंत्री बनूंगा।' विलासराव की यह बात सच साबित हुई। वैसे तो विलासराव हर बात को सहजता से लेते थे। शायद यही सहजता एक बार उन पर भारी भी पड़ गई। 1995 में जिस तरह वह कांग्रेस के खिलाफ गए, या 26/11 के मुंबई हमले के तत्काल बाद जिस तरह अपने हीरो बेटे रितेश देशमुख और फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा को लेकर वह ताज होटल के मुआयने पर गए, उसे लेकर उनकी आलोचना भी हुई। लेकिन कठिन समय में भी वह विचलित नहीं होते थे। इसी खूबी के चलते वह हर परिस्थिति से उबरते चले गए। विलासराव देशमुख का विवादों से भी नाता रहा है। उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में फिल्मकार सुभाष घई को फिल्म संस्थान बनाने के लिए सरकार की ओर से 20 एकड़ जमीन मुहैया कराई थी, जिसे 2012 में बांबे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया और सुभाष घई को जमीन लौटाने का आदेश दिया। 2010 में अपने भाई के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मामले में मुंबई पुलिस पर दबाव डालने की शिकायत मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। विलासराव देशमुख मुंबई में 26/11 हमले के बाद अपने बेटे रितेश देशमुख और फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा के साथ होटल ताज का मुआयना करने पहुंचे। विपक्ष ने उनकी जबरदस्त आलोचना की और आरोप लगाया कि वो अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए रामगोपाल वर्मा को होटल ताज ले गए। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि देशमुख को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। सीएजी की एक रिपोर्ट में भी विलासराव देशमुख पर अपने मुख्यमंत्री के पद के दुरुपयोग करने का आरोप लगा। इसमें उनपर अपने परिवार द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्ट को सस्ते में 23,840 वर्ग मीटर के प्लॉट का आवंटन करने का आरोप लगाया गया। आरोप लगा कि उन्होंने एक चौथाई कीमत पर प्लॉट का आवंटन करवाने में भूमिका निभाई। चर्चित आदर्श घोटाले में भी देशमुख का नाम उछला। विलासराव देशमुख 12.19 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की संपत्ति छोड़ गए हैं। इस साल जब वह राज्यसभा के लिए पर्चा भर रहे थे, तो उन्होंने दिए गए हलफनामे में अपने पास 12.19 करोड़ की संपत्ति होने की जानकारी दी थी। देशमुख और उनकी पत्नी वैशाली के पास 7.11 करोड़ रुपए की चल संपत्ति, मुंबई के उपनगरीय इलाके वर्ली में 950 वर्ग फुट के फ्लैट के रूप में अचल संपत्ति और लातूर जिले के अपने पैतृक गांव बबलगांव में 5.08 करोड़ रुपए की संपत्ति होने की जानकारी दी गई थी। लातूर में उनके पास 1.11 करोड़ रुपए की कृषि भूमि और उनकी पत्नी के पास 15.40 लाख रुपए की गैर कृषि भूमि होने की जानकारी दी गई थी। देशमुख के पास 2.2 लाख का 100 ग्राम सोना, जबकि उनकी पत्नी के पास 43.80 लाख रुपए मूल्य के सोने और हीरे के गहने होने की बात बताई गई थी। खास बात यह है कि हलफनामे के मुताबिक देशमुख के पास कोई वाहन नहीं था।

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