आज आमिर ने बताया, कौन है जिंदगी का असली हीरो
आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' में जिंदगी की चुनौतियों को जिंदादिली और साहस के साथ जी रहे शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की बातों ने दर्शकों का दिल छू लिया। शो की शुरूआत आमिर ने श्रेया चतुर्वेदी के वीडियो से की, जो 11 साल की हैं और मां के साथ दिल्ली में रहती हैं। वह मां को अपना दोस्त मानती हैं। वह टीचर या डॉक्टर बनना चाहती हैं। उनके पैर खराब हैं और वह ह्वीलचेयर से चलती हैं। उनका कहना है कि भगवान ने उनको जो भी दिया है, उनसे वह खुश हैं। शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उनकी जिंदादिली की तारीफ करते हुए आमिर अगली कहानी की ओर बढे। यह कहानी है त्रिचरापल्ली के साईं प्रसाद की। उनका कहना है कि विकलांगो की भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां पर उनके लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उन्होंने अमेरिका के बारे में बताया कि वहां पर ऐसे लोगों की जिंदगी को आसान बनाने के लिए अच्छे इंफ्रस्ट्रक्चर विकसित किए गए हैं। 
साईं की इस बात के बाद शो यह बताया गया कि आखिर वह कौन सी जगहें हैं, जहां विकलांगों को विशेष सुविधाओं की जरूरत होती है, जिसे साईं इंफ्रस्ट्रक्चर कह रहे हैं।
दिल्ली का इंटरस्टेट बस डिपो...बेंगलुरू का सरकारी दफ्तर की सीढियां...मुंबई का जनरल पोस्ट ऑफिस की सीढियां...कहीं शारीरिक कठिनाईयों से जूझते लोगों के लिए कोई सुविधा नहीं। 
कहानी आंखो से महरूम आइआइटी में प्रोजेक्ट टीम लीडर कृष्णकांत माने की
कृष्णकांत माने बचपन से ही कुछ अलग थे। तीन साल से ही आंखों में तकलीफ होने लगी। कुछ दिनों बाद उनको दिखना बंद हो गया लेकिन जिंदगी से उनका इश्क कम नहीं हुआ। पढ़ाई जारी रखकर खास बनने की उनकी तैयारी शुरू हुई। कंप्यूटर से गहरी दोस्ती की और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गए। आज आइआइटी में प्रोजेक्ट लीडर बनकर वह तीस लोगों को लीड करते हैं। खाली समय में कविताएं लिखते हैं और पहाड़ पर भी चढ़ते हैं। 
कृष्णकांत से आमिर ने पूछा कि पूछा कि क्या ट्रैकिंग में उनको डर नहीं लगता? जवाब में कृष्णकांत ने कहा कि खतरे तो जिंदगी में हर कदम पर है तभी तो इंश्योरेंस कंपनियां चल रही हैं। एक घटना को उन्होंने याद किया जब ट्रैकिंग के दौरान एक बुढिया ने अफसोस जताते हुए कहा था कि उनके साथ चल रहे लोगों ने मुझे पहाड़ पर चढ़ाकर बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं...लेकिन लोगों ने बुढ़िया कि बताया कि कृष्णकांत ही उनको यहां लीड करके लाए हैं। 
कृष्णकांत का कहना है कि सिचुएशन के सामने किसी को सरेंडर नहीं करना चाहिए। मां-बाप ने हमेशा उनको रेगुलर स्कूल में भेजा, जहां उनसे बराबरी का व्यवहार हो सके। कभी उनको अलग नहीं समझा। कृष्णकांत कहते हैं कि विकलांगों को खुद को किसी से कम नहीं समझना चाहिए और अपनी जिम्मेदारी का एहसास करना चाहिए। मां-बाप को ऐसे बच्चों को रेगुलर स्कूल में डालना चाहिए। 
कृष्णकांत के मां-बाप ने भी लोगों से अपील किया कि वह अपने विकलांग बच्चों को स्वीकार करें और उनको रेगुलर स्कूल भेजें। 
ऐसे बहुत कम स्कूल हैं, जिसमें विकलांगों को सामान्य बच्चों के साथ एडमिशन दिया जाता है। नई दिल्ली के अमर ज्योति स्कूल ने ऐसा करके मिसाल कायम किया है और दोनों तरह के बच्चों को साथ पढ़ाने के फायदे को साबित करके दिखाया है।
270 विकलांग लोगों ने मिलकर खड़ी कर दी वर्ल्ड की बेस्ट ई-लर्निंग कंपनी
अहमदाबाद की ई-लर्निंग कंटेंट बनानेवाली कंपनी 'डिजाइनमेट' में 70 फीसदी से ज्यादा लोग किसी न किसी शारीरिक परेशानियों से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस कंपनी को खड़ा करने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। ऐसे लोगों के काम करने के सपने को साकार करने का श्रेय जाता है सीइओ कैप्टन कमलजीत सिंह बरार को।
कैप्टन बरार ने कहा कि 270 विकलांग लोग उनकी कंपनी में काम कर रहे हैं और वह बहुत हार्ड वर्क करते हैं जिसके कारण उनकी कंपनी वर्ल्ड की बेस्ट ई-लर्निंग कंपनी बन गई हैं।

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