गीता गीत का ही ध्वनि विस्तार है : दाधीच
जोधपुर।  
मानवजाति का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि कविता अनादिकाल से मनुष्य का मार्गदर्शन करती रही है। कुरूक्षेत्र की धरती पर जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया तो उसे गीता नाम दिया गया जो अवश्य ही कोई गीत रहा होगा इसलिए कहा गया है कि गीता गीत का ही ध्वनि विस्तार है।उक्त उद्गार सुप्रसिद्ध गीतकार किशन दाधीच ने व्यक्त किए। 
वे रविवार को भारतीय साहित्य विकास न्यास, राजस्थान एवं अन्तर प्रान्तीय कुमार साहित्य परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ गीतकार सत्यदेव संवितेन्द्र के गीत संग्रह “शब्दों के पदचिन्ह“ का लोकार्पण करतेे हुए बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कविता सामाजिक बेहतरी के हर प्रयास को बल देती रही है। इसलिए कबीर, सूर, रहीम और तुलसी सहित ऐसे समस्त रचनाकारों की प्रासंगिकता आज भी है। ऐेसे में संवितेन्द्र के गीत संग्रह “शब्दों के पदचिन्ह“ का पुस्तक रूप में आना एक शुभ संकेत है। संवितेन्द्र के गीतों में माटी की मोहक छवि, खेजड़ी, गोडावण, नड़ व अलगोजा तथा थार सौन्दर्य के रूपाकार नजर आते हैं। इसलिए वे हमारे समय के आंचलिकता के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं।
समारोह के अध्यक्ष प्रसिद्ध कवि-आलोचक डाॅ. आईदान सिंह भाटी ने कहा कि आज का बाजारवाद मानवता की जड़ों को कमजोर कर रहा है, इन जड़ों को साहित्यकार सींचते हुए मानवता को बचाए रखने के अपने सारे उपक्रम करता है। ऐसे में “शब्दों के पदचिन्ह“ रचते हुए संवितेन्द्र अपनी उसी प्रखर भूमिका में नजर आ रहे हैं।
विशिष्ट अतिथि पूर्व न्यायाधीश एवं कवि-कथाकार मुरलीधर वैष्णव ने कहा कि अक्षर ब्रह्म है और काव्य में ढ़लते हुए वह मनुष्य के भीतर की ताकत बन जाता है। यह ताकत समस्त विधाओं के सृजन में समाहित रहती है इसलिए समाज में रचनाकार की भूमिका रेखांकित होती है।
समारोह में गीतकार सत्यदेव संवितेन्द्र ने “शब्दों के पदचिन्ह“ से चयनित गीतों का वाचन करते हुए कहा कि कहा कि लगातार सूखती जा रही गीतों की धारा को बचाए रखना हमारे समय की महती आवश्यकता है। संवितेन्द्र की गीत सृजन यात्रा की सार्थक पड़ताल करते हुए लेखिका एवं कवयित्री डाॅ. पद्मजा शर्मा ने संग्रह के गीतों को जन-जन के कंठों पर बसने वाले गीतों की संज्ञा दी।
इससे पूर्व मंचासीन अतिथियों के साथ डाॅ. ओमप्रकाष भाटिया, उपेन्द्र सिंह राठौड़, जैसलमेर, विरेन्द्र लखावत सोजत शहर, जितेन्द्र जालौरी, जालौर आदि प्रदेष भर से आये रचनाकारों ने माॅ सरस्वती के साथ भारतीय साहित्य विकास न्यास के संस्थापक स्व. हनुमान सरावगी के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलन कर माल्यार्पण किया
प्रारंभ में समारोह संयोजक कवि आनन्द हर्ष ने स्वागत भाषण दिया एवं अंत में रंगकर्मी कमलेश तिवारी ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का सरस संचालन डाॅ. हरिदास व्यास ने किया। 
इस मौके पर डाॅ. सोनाराम विश्नोई, हबीब कैफी, डाॅ. रेणु शाह, दीप्ती कुलश्रेष्ठ, डाॅ. ओमप्रकाश भाटिया, किरण राजपुरोहित ’नितिला’, डाॅ. हेमन्त शर्मा, दिनेश ंिसंदल, डाॅ. नीतु परिहार, आकाश मिढ्डा, छगन राव, सुषमा चैहान, आकाश नौरंगी, अर्जुनदान चारण, डाॅ. महेन्द्र सिंह तंवर, डाॅ गजेसिंह राजपुरोहित, रंगकर्मी श्याम पंवार आदि बड़ी संख्या में साहित्यकार रंगकर्मी उपस्थित थे। 

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