जानिये अटल बिहारी का जीवन परिचय 
जयपुर। 
अटल बिहारी वाजपेयी के पास बोलने की एक अनोखी शैली के अलावा गहराई से बातों को समझने की एक अनमोल शक्ति भी थी। उन्होंने जिंदगी के हर पड़ाव पर खुद को साबित किया और सफलता प्राप्त की। 

उनके बारे में अक्सर कहा जाता था कि वे अपने विरोधियों के बारे में भी इतने सम्मानजनक तरीके से बोलते थे कि बिना अपमान किए बस बात का मतलब साफ हो जाता था। वे एक बेहतरीन व संवेदनशील कवि भी थे और समय समय पर अपनी कविताऔं से लोगों को जिंदगी का फलसफा समझा दिया करते थे। 

अपने जीवन में राजनीति के कई पड़ाव तय करने के बाद और नेहरू-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई।

अपने देश की सेवा करने के व्रत को लेकर अटल बिहारी ने ताउम्र शादी नहीं की। 

सहज और स्वाभाविक व्यक्तित्व
उनके व्यक्तित्व की सहजता और स्वाभाविकता एक बड़ी विशेषता थी। एक बार अटलजी सोलन में आए। बहुत प्रयत्न करके उन्हें 11 हजार रूपये की थैली भेंट की गई। कार्यRम के बाद वे चाय पी रहे थे। तभी एक कार्यकर्ता ने कहा कि आपका भाषण बहुत ओजस्वी था, पर बहुत छोटा था। अटलजी अपने अंदाज में कह उठे- सिर्फ 11 हजार रूपये में कितना भाषण किया जा सकता था। पूरा वातावरण फिर हंसी में गूंज उठा।

जन्म और परिवार
अटल बिहारी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को ग्वालियर में हुआ था। एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरूआती सफर जरा भी आसान न था। 

वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई थी। उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना कॅरियर शुरू किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन
अटल बिहारी वाजपेयी 1951 में भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे। 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया था। लखनऊ में वे चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे थे। 

1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे ।1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और उनके पहले भाषण में ही लोगों को इस बात का भान हो गया था कि यह व्यक्ति भविष्य में राजनीति में प्रभावपूर्ण व्यक्ति साबित होगा।

1980 में वो भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे। 1980 से 1986 तक वो भाजपा के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो भाजपा संसदीय दल के नेता भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं। 1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और भारत के प्रधानमंत्री बने। लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए। 

1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली।

आवाज ने साथ छोड़ा 
यह नियति की विडंबना ही कही जाएगी कि जिस व्यक्ति की आवाज सुनने के लिए लोग कतार लगा कर खड़े हो जाते थे उसी आवाज ने उनका साथ आज हमेशा हमेशा के लिए छोड़ दिया है। डिमेंशिया होने की वजह से वे अब किसी को पहचानते भी नहीं हैं।

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