मानव सुख को ढूंढने में अपनी अमूल्य जिंदगी खो रहा है- साध्वी प्रियरंजनाश्री
बाड़मेर।
थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में प्रखर व्याख्यात्री साध्वीवर्या श्री प्रियरंजनाश्रीजी म.सा. ने चातुर्मास के चालीसवें दिन अपने प्रवचन में कहा कि आत्मशुद्धि का प्रमुख एवं सर्वश्रेष्ठ साधन यदि कोई है तो वह कायोत्सर्ग है। क्योंकि कायोत्सर्ग से आत्मा का निरीक्षण होता है। प्रशस्त अध्यवसायों की वृद्धि होती है। इतना ही नहीं शुद्ध-विशुद्ध मन से किये गये कायोत्सर्ग से सर्व दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। कायोत्सर्ग करने के पीछे एक महत्वपूर्ण हेतु रहा हुआ है। कायोत्सर्ग करते समय सब कुछ भूल जाना है। काया देह को भी भूल जाने की बात है। वहां अन्य को याद रखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
साध्वी श्री ने कहा कि अनादिकाल से आत्मा संसार के पौद्गालिक सुखों के पीछे पागल बनी है। उसने बाहृ जगत में या बाहृ सुखों में ही सुख खोजने का प्रयास किया है। किन्तु वह यह भूल जाता है कि कस्तूरी मृग की नाभि में रही कस्तूरी की तरह सुख हमारे अंदर ही है, बाहर नहीं। किन्तु भ्रमणा में पड़ा जीव मृग की तरह कस्तूरी अपने स्वयं के पास होने पर भी बाहर ढूंढता रहता है। वैसे ही सुख को ढूंढने में अपनी अमूल्य जिंदगी खो रहा है।
हमारे ज्ञानियों ने संसार के सुखों को मृगजल की उपमा दी है। जिन बाहृ पदार्थों में आप सुख देख रहे हो वह सुख नहीं है। अपितु सुख का आभास मात्र है। बल्कि यूं कहें कि वह सुख, सुख नहीं दुःख का मूल है तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी।
हम जिस पदार्थ में सुख मान रहे हैं वह तो दुःख का मूल है क्योंकि ज्यादातर संसार में यह देख रहे हैं कि संसार के प्राणी जहां से थोड़ा सा सुख पाते हैं वहीं से समय जाने के बाद अपार दुःख, वेदना का अनुभव करते हैं। पुत्र जन्म में हमने सुख माना किन्तु जिस दिन पुत्र की मृत्यु होगी उस दिन हमें कितना दुःखी होना पड़ेगा। सुख बाहृ पदार्थों में नहीं बल्कि अन्तर आत्मा में पड़ा है। आत्मा स्वयं अक्षय सुख का खजाना है। उसे बाहृ पदार्थों में न ढूंढते हुए अंदर में ही ढूंढना चाहिये।
किसी भी अनुष्ठान को मन में आया वैसे कर लेने से उस अनुष्ठान या क्रिया का फल नहीं मिलता है। हर क्रिया अनुष्ठान के विधि-विधानों से ही क्रिया अनुष्ठान करना चाहिये।
साध्वी श्री ने कहा कि सौम्य स्वभाव सहज रूप कब बनता है? जब नजर के सामने सभी अच्छे या बुरे प्रसंग को बाहृ से नहीं देखकर गहराई से देखने की कला हासिल की हो। ऐसी कला हस्तगत न हो तो कदम-कदम पर मन संक्लेश कर लेता है। ऐसी कला को हस्तगत करने के लिये जड़ वस्तुओं के विचित्र स्वभाव तथा कर्माधीन जीवों की विचित्र मनोदशा इन दोनों को सदैव अपने समक्ष रखने जैसी है।
साध्वी डाॅ. दिव्यांजनाश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि जहां कहीं भी किसी भी व्यक्ति में दोष दिखाई देते हो तो इन दोषों को देखकर उस व्यक्ति पर द्वेष करने के बजाय उस व्यक्ति के भूतकाल के भवों को सामने ला देना। द्वेष अपने आप चला जायेगा और द्वेष के स्थान पर मैत्री आ जायेगी।
मन से हमारा भविष्य बिगड़ जाता है। स्वभाव में सौम्यता अभी लाना सरल नहीं है। क्योंकि अभी तो हमारे स्वभाव में दुष्टता की बदबू आ रही है। चारों तरफ अपनी मान्यता का वातावरण दिखाई दे रहा है। वातावरण को देखते ही उग्रता आ जाती है। ऐसी गलत प्रकृति को छोड़े बिना सौम्य स्वभाव सहज नहीं बनेगा।

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