उपेक्षा करें या उन्मूलन के उपाय

चिंतन- डॉ. दीपक आचार्य
मानव सभ्यता के विकास के साथ ही सत्, रज व तम के गुणों का पूर्ण प्रभाव व्यष्टि व समष्टि पर रहा है। इनका न्यूनाधिक असंतुलन ही व्यक्ति के समग्र जीवन से लेकर परिवेश तक में उद्दीपन, परिवर्तन और परिमार्जन की भावभूमि का जनक होता है।

हर युग में इन त्रिगुणों का साम्य-वैषम्य, संतुलन-असंतुलन और घनत्व का घटता-बढ़ता परिमाण स्पष्ट दृष्टिगोचर होता रहा है। कभी यह रचनात्मक इतिहास रचता है तो कभी विध्वंस का। जड़ से लेकर जगत तक में इन्हीं का प्रभाव हमेशा कुछ न कुछ नया माहौल पैदा करता रहता है।

सत् त्रेता, द्वापर और कलियुग तक आते-आते सत्व का प्रभाव उत्तरोत्तर क्षीण होता गया व आज कलि के प्रभाव में तामसिकता का जोर हर कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है। एक तो आदमी के भीतर तामसिक बीजों का प्रभाव रक्त से लेकर सवार्ंंग तक है। दूसरी ओर खान-पान से सात्विकता गायब है और तामसिकता बढ़ी है। हम जो कुछ खा रहे हैं वह तम प्रधान है वहीं जमाने भर को भी अब वही मिर्च-मसाला भाने लगा है जो तामसिक है। इसी प्रकार व्यक्तिगत स्वार्थो की धुंध ज्यादातर लोगों के दिलों दिमाग पर ऎसी जबर्दस्त छायी हुई है कि उन्हें अपने स्वार्थ और भोगों के सिवा कुछ भी दिखता तक नहीं।

यही वजह है कि हमारे आस-पास, अपने इलाके में और दुनिया के कई हिस्सों में नालायक और खुदगर्ज लोगों की तादाद निरंतर बढ़ती ही जा रही है। जमाने भर की तामसिकता ओढ़े बैठे इन लोगों की जिंदगी न किसी अनुशासन में बंधी होती है न मानवीय मूल्यों की डोर से।

इस किस्म में पढ़े-लिखे भी हैं और अनपढ़ भी। लेकिन पढ़े-लिखे शातिर और चालाक हैं तो बिना पढ़े लिखे भी कोई कम नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि अनपढ़ लोग नासमझ होते हुए भी अपने स्वार्थ के प्रति समझदार होने के बावजूद नासमझ बन कर आडम्बरों व पाखण्डों का सहारा लेते हुए चुपचाप अपनी मंजिल पाते रहते हैं।

आज किसी भी क्षेत्र में काम की गुणवत्ता का कोई पैमाना नहीं रहा, राष्ट्रीय चरित्र व स्वाभिमान नहीं रहा, सामाजिक दायित्वों का बोध जाने कहीं कब दफन हो गया और आदमी ने खूंटी पर टांग दी अथवा गिरवी रख दी अपनी आदमीयत।

असल में वो आदमी रहा ही कहाँ जमाने में, जिसमें धर्म, कर्म व फर्ज को निभाने का माद्दा था, दुनिया के लिए काम आने का जज्बा था और नया इतिहास बनाने का सुनहरा कौशल भी। कुछ संस्कारवान और मानवीय मूल्यों के संवाहक परिवारों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर लोग हर कहीं ऎसे मिल ही जाते हैं जो नालायक और खुदगर्ज हैं, वह भी ऎसे कि किसी भी सीमा तक नीचे गिर सकते हैं।

फिर इनका साथ देने वाले इसी किस्म के पालनहारों, आश्रयदाताओं और संरक्षकों (गॉड फादर्स ) की कहाँ कोई कमी है। तकरीबन हर क्षेत्र में ऎसे नालायकों और खुदगर्जो के कई समूह बने हुए हैं जो समाज की छाती पर मूंग दल रहे हैं।

इस किस्म के तथाकथित आदमियों के लिए सिर्फ और सिर्फ अपने काम ही अहमियत रखते हैं। अपने काम निकलवाने के लिए ये लोग भी मुद्रा या भावों में पसरने से लेकर कुत्तों की तरह भौंक-भौंक धौंंस जमाने और गिद्धों की तरह झपटने के ऎसे आदि हो जाते हैं कि इनके चेहरों पर भी कुत्तों, लोमड़ों व गिद्धों की शक्ल आकार पा लेती है।

दुनिया का कोई कैसा भी प्राणी हो, उसके वैचारिक धरातल, सोच तथा वृत्तियाँ मिलकर उसके चेहरे पर गुण या अवगुण विशेष को संकेतित करने वाली आभा को बिम्बित कर ही देती हैं। इस दृष्टि से किसी भी व्यक्ति के चेहरे व प्रवृत्तियों में निरंतर साम्यता बनी रहती है। अंतस् के भावों का चेहरे पर स्पष्ट प्रकटीकरण वह अवश्यंभावी शारीरिक प्रक्रिया है जिससे कोई बच नहीं सकता।

इसी प्रकार नालायकों व खुदगर्ज लोगों की मुखाकृति भी किसी न किसी जानवर से मेल खाती ही है। कई सारे जानवरों के मौलिक लक्षण होने पर चेहरे की अजीब सी बनावट ऎसी हो जाती है जिसका ईलाज किसी ब्यूटी पॉर्लर में उपलब्ध नहीं है।

आज ऎसे लोगों की भरमार होती जा रही है जो कुछ भी नहीं हैं मगर जमाने भर में ’हम चौड़े बाजार संकरा ’ वाली कहावत को चरितार्थ करने लगे हैं। कुछ लोग तो इतने नालायक व नाकाबिल हैं कि खुद कोई रचनात्मक काम नहीं कर सकते। न पढ़े-लिखे हैं, न संस्कारवान। न धीर-गंभीर, न शालीन।

ऎसे-ऎसे लोग भी हमारे सम्पर्क में आते हैं जिनमें खुद के पुरुषार्थ के बूते कमा खाने या पेट भरने की प्रतिभा तक नहीं हुआ करती लेकिन किसी न किसी जानवरी गुण के भरोसे वे ऎसे-ऎसे कारनामे कर रहे हैं कि मानवता भी शर्माती है और जमाना भी।

ऎसे नालायकों व खुदगर्जों ने समाज के अच्छे लोगों का जीना हराम कर रखा है। हालांकि ये नालायक लोग अकेले कुछ कर पाने का साहस या दम-खम नहीं रखते किंतु आसुरी गुणों का सहारा लेते हुए समूहों के रूप में मण्डरा कर चिल्लपो मचाते रहते हैं। कभी ये बहुरूपियों की तरफ व्यवहार करने लगते हैं, कभी वृहन्नलाओं की तरह, और कभी गणिकाओं की तरह।

कई आदमी तो ऎसे हैं जो इन तीनों ही किरदारों को अच्छी तरह जीये जा रहे हैं। इनकी हरकतों को देखकर लगता हैं कि इन्हें मनचाहा शरीर दिया होता तो आज न सिर्फ अपने क्षेत्र के बल्कि दुनिया भर में करिश्माई छवि का गौरव प्राप्त कर लेते।

इन नालायकों, स्वार्थी व चापलुसों से बचने के दो ही रास्ते हैं। एक तो यह कि जहाँ मौका मिले, सदैव इनकी उपेक्षा करते रहें या हर अवसर पर इन्हें हतोत्साहित करते हुए इन्हें अपनी औकात का भान कराते रहें और इनके समूल उन्मूलन के लिए कोई भी सात्विक साधन इस्तेमाल करने से कभी नहीं चूकें।

समाज को वास्तविक खतरा ऎसे नालायकों व खुदगर्ज लोगों से नहीं बल्कि उन लोगों से हैं जो इन नरपिशाचों की हरकतों को चुपचाप देखते, सुनते और बर्दाश्त करते रहते हैं। हम सभी को यह प्रण लेना होगा कि इस प्रदूषण से समाज, परिवेश व अपने क्षेत्र को बचाएं।

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