नालायकों के लिए जाया न करें अपना समय और शक्तियाँ

डॉ. दीपक आचार्य
हर व्यक्ति की जिन्दगी में संघर्ष होते हैं। ये संघर्ष न हों तो मनुष्य में न निखार आ सकता है और न ही उसका जीवन सँवर सकता है। यह मनुष्य ही है जिसे मनुष्यों से लेकर प्रकृति परविजय पाने के अभियान के लिए भेजा गया है।ऐसे में हर मनुष्य के लिए शैशव से लेकर अंतिम दिन तक के लिए असंख्यों चुनौतियों के साथ जीने का दौर लगातार बना रहता है। ये चुनौतियां और संघर्ष अपनों और अपने कहे जाने वालेलोगों से भी हो सकते हैं, परायों से भी और उन लोगों से भी जिनका हमसे किसी भी प्रकार का दूर-दूर का कोई संबंध न हो। परिवेश, क्षेत्र और प्रकृति से भी।
इन तमाम स्थितियों में कई चुनौतियाँ ऐसी होती हैं जिनका हमारे जीवन या व्यक्तित्व से कोई रिश्ता नहीं होता है लेकिन जमाने भर के प्रदूषणों और खर-दूषणों के बीच जीने की विवशता केकारण कुछ तो दुर्गन्ध हम तक पहुंचती ही है अथवा हमारे आस-पास मण्डराती रहती है।
पिछले कुछ दशकों से एक नई महामारी पैदा हो गई है। हर इलाके में कुछ लोग सिर्फ इसीलिए पैदा होते हैं कि किस प्रकार समाज की शांति और सुकून को भंग किया जाए। अपने इलाके मेंभी ऐसे खूब सारे लोग हैं जो न खुद चैन से जी रहे हैं और न ही औरों को चैन से जीने देते हैं। समाज की आधे से ऊपर समस्याओं की जड़ ही ये कमीन और नालायक लोग हैं।
हम कितना ही अच्छा सोचते, दिखाते और करते रहें पर जिन्दगी भर कुछ न कुछ समस्याएं और नालायक लोग हमेशा पीछे लगे ही रहते हैं। इसका मूल कारण यह है कि जनसंख्या काजबर्दस्त विस्फोट होता जा रहा है, ऐसे में पशुओं के बार-बार खत्म होकर वापस ऊपर पहुँचते रहने की वजह से परेशान भगवान ने अब इन पशुओं को मनुष्य के रूप में धरा पर भेजना आरंभ कर दियाहै ताकि अपनी आसुरी वृत्तियों, पशु बुद्धि और दूसरे किसी न किसी चतुराई भरे हुनर से बरसों यहीं गुजार दें और बार-बार कट कर ऊपर जाने की समस्या से भगवान को भी कोई दिक्कत न हो।

यही कारण है कि हमारे आस-पास ऐसे-ऐसे लोगों की भरमार होती जा रही है जो न पूर्ण मनुष्य दिखाई देते हैं न पूर्ण पशु। बीच के इन अवतारियों की वजह से ही पृथ्वी पर दुष्ट वृत्तियों का भारबढ़ता जा रहा है और इस वजह से दुनिया का माहौल खराब होता जा रहा है।

हमारा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है जहाँ भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो पशुओं की तरह सिंग मारते हुए कहीं भी घुसपैठ कर लेते हैं और जो कुछ मिल जाए उसे हजम कर लेते हैं।

खूब सारे ऐसे लोग हैं जिनकी असुरों से तुलना की जाए तो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं और कहीं से लगता नहीं कि ये मनुष्य हैं, सिवाय मनुष्य के रूप में पैकिंग के। इनकी सारी प्रवृत्तियांसमाज और राष्ट्र के लिए घातकता के दौर में पहुंच चुकी हैं।

इतना सब कुछ होते रहने के बावजूद हम चिल्लाने के आदी हो गए हैं कि जमाना खराब है। हमने कभी यह नहीं सोचा कि जमाने को खराब बताने और करने के लिए हम ही जिम्मेदार हैं औरइस बात को हमें अच्छी तरह सोचना होगा।

हमें यह स्वीकारना होगा कि हम हमारे क्षुद्र स्वार्थों, क्षणभंगुर पद-प्रतिष्ठा और मिथ्या लोकप्रियता पाने, हराम की कमाई, तस्करी और भ्रष्टाचार तथा बेईमानी को संरक्षण देने के लिए उनलोगों की परिक्रमा करते हैं, तलवे चाटते हैं और जयगान करते हैं जिनका जीवन असुरों से कम नहीं है।

अपने मामूली स्वार्थों के लिए हम इन आसुरी वृत्तियों वाले लोगों के हर जायज-नाजायज काम करने को आतुर रहते हैं, इनके सामने हाथ फैलाकर भिखमंगों तक को शर्मिन्दा कर देते हैं,अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर परोस देते हैं और इनके लिए वह सब कुछ परोसने के लिए हमेशा तत्पर रहा करते हैं जिनसे आसुरी शक्तियाँ खुश होकर हमें आसुरी सम्पदा प्रदान करती हैं।

मनुष्यता और अपनी परंपराओं को भुला बैठे उन लोगों के कारण ही आज समाज दुरावस्था को प्राप्त करता जा रहा है, जिन लोगों के जीवन का मकसद ही आसुरी वृत्तियों और आसुरी व्यक्तियोंको संरक्षण प्रदान करते हुए अपने स्वार्थों को पूरा करना है। अपने स्वार्थों में हम इतने डूब गए हैं कि हमें अपने-पराये का कोई ख्याल नहीं रहा। गलाकाट प्रतिस्पर्धा में हम कुछ भी पाने के लिए किसीभी आत्मीयजन का खात्मा तक कर सकने की दानवीय बुद्धि को पा चुके हैं।

इस अनुचरी प्रजाति में बुद्धि के बूते या बुद्धि को बेचकर जीने वाले बुद्धिजीवियों से लेकर आवारा, गुण्डे, उठाईगिरे और बदमाश सब शामिल हैं। जरा अपने इलाके में ही नज़र दौड़ा लें तो स्पष्टपता चल जाएगा कि आजकल किस किसम के लोग अपने इर्द-गिर्द या अपने इलाके में फब रहे हैं। न पढ़ाई का पता है, न कोई व्यक्तित्व, न जीवन की समझ, न बड़ों या विद्वजनों के प्रतिआदर-सम्मान का भाव। सब कुछ स्वाहा हो चला है। नालायकों को जब उन्हीं की तरह के नालायक मिल जाते हैं तब समाज का कबाड़ा अपने आप होने लगता है। इन नालायकों को प्रश्रय देने वालेलोग कुछ समय के लिए अलग हट जाएं तो समाज का अपने आप भला हो जाए, किसी को कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, अपने आप अपना भारत महान हो सकता है।

लेकिन समाजोन्मुखी दृष्टि के अभाव में ऐसा हो पाना संभव नहीं है, न इन लोगों में इतना आत्मविश्वास ही बचा है कि ये अपने आपमें किसी प्रकार का सुधार ला सकें। बदलना उन्हीं लोगोंको होगा जो समाज के लिए कुछ करने का माद्दा रखते हैं।

जिन लोगों को समाज के प्रति उत्तरदायित्वों का बोध है उन्हें उन सभी कामों को छोड़ना होगा जिनसे आसुरी शक्तियां प्रबल होती हैं और प्रोत्साहन या संरक्षण प्राप्त होता है। पैशाचिक वृत्तियों केलोगों का साथ छोड़ देकर हम समाज के विनाश को संबल प्रदान कर सकते हैं क्योंकि आज जो लोग समाज की छाती पर मूंग दल रहे हैं उन्हें किसी न किसी रूप में हमारा भी परोक्ष या अपरोक्षयोगदान इस रूप में है कि हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी अपनी मनुष्यता को छोड़ कर ऐसे लोगों के साथ लगे हुए हैं। जीवन मंे किसी भी मोड़ पर किसी नालायक को प्रोत्साहन या संबल देनेका सीधा सा मतलब है हमारे भविष्य और सामाजिक व्यवस्थाओं पर कुठाराघात। क्योंकि ये नालायक लोग हर दृष्टि से अपात्र होते हैं और अपना वजूद बनाए रखने के लिए ये किसी भी सीमा तकनीचे गिर और पसर सकते हैं।

जो लोग इन नालायकों के लिए अपना समय और शक्तियाँ खर्च करते हैं उन्हें यह गंभीरता से सोचना होगा कि वे अपनी मौत का सामान बाँध रहे हैं क्योंकि आज नहीं तो कल इन नालायकोंसे हमें जो प्रताड़ना और दंश प्राप्त होंगे, वे जीवनपर्यन्त हमें कोसते रहने वाले हैं और तब नालायकों को हमारे द्वारा दिए गए प्रोत्साहन, संबल और योगदान का स्मरण कर हमें हर क्षण ग्लानि औरदुःख का अनुभव होगा और यही स्थिति हमारे लिए जीते जी मरने के बराबर होगी। अब भी समय है। जगना हमें ही होगा और सोचना होगा कि हमारे लिए अपने क्षुद्र स्वार्थ बड़े हैं अथवा समाज याराष्ट्र.......?

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