बड़ोदिया में बन रहे है श्रीफल के गणेश
शर्मा बताते हैं की चार फीट ऊँची इस प्रतिमा के निर्माण लगभग पूरा हो चुका है और इस प्रतिमा के निर्माण के लिए अब तक 400 से अधिक श्रीफल, 12 किलो फेविकोल और दो किलो मोली का उपयोग किया गया है। शर्मा कहते हैं की श्रीफल से प्रतिमा निर्माण दुष्क है तथापि युवाओं के पर्यावरण प्रेम, उत्साह और जज्बे को देखते हुए उन्होंने गत वर्ष की भांति एक नए प्रयोग व चुनौती के रूप में लेकर निर्माण आरंभ किया है और यह सफल भी हो गया है। वे बताते हैं की उन्होंने लकडी व मिट्टी से तो की गणेश प्रतिमाओं के निर्माण किया है और श्रीफल से निर्मित उनकी यह दूसरी गणेश प्रतिमा है। प्रतिमा के निर्माण इन दिनों अंतिम चरण में है और इसके श्रृ़गार और अन्य कार्यो पर ध्यान दिया जा रहा है।
श्रीफल से गणेश प्रतिमा निर्माण पर विनायक समिति के हेमंत पानेरी व रणछोड सोलंज़ी बताते हैं की प्रतिवर्ष कस्बे में प्लास्टर ऑफ पेरिस से निर्मित तीन दर्जन से अधिक प्रतिमाओं के विसर्जन गांव के शिव मंदिर स्थित तालाब में किया जाता है और इससे तालाब के जल प्रदूषित हो रहा था। पर्यावरण के प्रति जागरूक गांव के कुछ मण्डलों ने तो इस स्थिति से निबटने के लिए धातु ज़ी प्रतिमाएं बनवा ली हैं परंतु मण्डल के कुछ सदस्यों ने अनूठा और इसको फ्रेण्डली गणेशोत्सव मनाने के सुझाव दिया तो सर्वसंमति से श्रीफल के गणपति बनाने के निर्णय लिया गया। वे बताते हैं की गांव में उनके मण्डल द्वारा इस प्रकार के अनूठा कार्य किया जा रहा है तो इसके प्रति सभी सदस्य भी उत्साहित है और उनका मानना है की इस प्रकार के कार्य से अन्य गणेश मण्डल भी प्रोत्साहित होंगे।
बांसवाडा, 13 सितंबर।
जिले में ईकोफ्रेण्डली गणेशोत्सव मनाने की मुहिम के चलते बड़ोदिया कस्बे के एक युवा मण्डल द्वारा गणेशोत्सव के लिए श्रीफल से गणपति की प्रतिमा के निर्माण करवाया जा रहा है। कस्बे के प्रताप मार्ग की श्री विनायक सेवा समिति द्वारा कस्बे में दूसरी बार इस प्रकार की प्रतिमा का निर्माण करवाया जा रहा है और इसके लिए गणेश प्रतिमाओं के निर्माण में सिद्धहस्त माने जाने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक व कष्ठशिल्पकर लीलाराम शर्मा के सेवाएं ली जा रही हैं। शर्मा इन दिनों अपने निवास पर अनुज सुरेश शर्मा के साथ पूरे उत्साह के साथ श्रीफल से प्रतिमा के निर्माण कर रहे हैं।
शर्मा बताते हैं की चार फीट ऊँची इस प्रतिमा के निर्माण लगभग पूरा हो चुका है और इस प्रतिमा के निर्माण के लिए अब तक 400 से अधिक श्रीफल, 12 किलो फेविकोल और दो किलो मोली का उपयोग किया गया है। शर्मा कहते हैं की श्रीफल से प्रतिमा निर्माण दुष्क है तथापि युवाओं के पर्यावरण प्रेम, उत्साह और जज्बे को देखते हुए उन्होंने गत वर्ष की भांति एक नए प्रयोग व चुनौती के रूप में लेकर निर्माण आरंभ किया है और यह सफल भी हो गया है। वे बताते हैं की उन्होंने लकडी व मिट्टी से तो की गणेश प्रतिमाओं के निर्माण किया है और श्रीफल से निर्मित उनकी यह दूसरी गणेश प्रतिमा है। प्रतिमा के निर्माण इन दिनों अंतिम चरण में है और इसके श्रृ़गार और अन्य कार्यो पर ध्यान दिया जा रहा है।
श्रीफल से गणेश प्रतिमा निर्माण पर विनायक समिति के हेमंत पानेरी व रणछोड सोलंज़ी बताते हैं की प्रतिवर्ष कस्बे में प्लास्टर ऑफ पेरिस से निर्मित तीन दर्जन से अधिक प्रतिमाओं के विसर्जन गांव के शिव मंदिर स्थित तालाब में किया जाता है और इससे तालाब के जल प्रदूषित हो रहा था। पर्यावरण के प्रति जागरूक गांव के कुछ मण्डलों ने तो इस स्थिति से निबटने के लिए धातु ज़ी प्रतिमाएं बनवा ली हैं परंतु मण्डल के कुछ सदस्यों ने अनूठा और इसको फ्रेण्डली गणेशोत्सव मनाने के सुझाव दिया तो सर्वसंमति से श्रीफल के गणपति बनाने के निर्णय लिया गया। वे बताते हैं की गांव में उनके मण्डल द्वारा इस प्रकार के अनूठा कार्य किया जा रहा है तो इसके प्रति सभी सदस्य भी उत्साहित है और उनका मानना है की इस प्रकार के कार्य से अन्य गणेश मण्डल भी प्रोत्साहित होंगे। श्रीफल गणेश देंगे दो संदेश भी :
बड़ोदिया में बनाई जा रही श्रीफल गणपति ज़ी इस प्रतिमा के माध्यम से इस बार पर्यावरण संरक्षण के दो संदेशों को भी प्रतिध्वनित किया जा रहा है। इस बार श्रीफल गणपति प्रतिमा के हाथ में अस्त्रों के स्थान पर संदेश स्थापित किया जा रहे हैं जिसके तहत एज़ हाथ में अधिकधिक वृक्षारोपण के लिए तथा दूसरे में प्रदूषणमुक्त जलाशयों के लिए स्लोगन लिखा जा रहा है।
पर्यावरण के लिए हितज़री व अनुकरणीय निर्णय
श्रीफल के गणपति निर्माण पर पर्यावरणीय विषयों के जानकार व डूंगरपुर जिले के मानद वन्यजीव प्रतिपालक वीरेन्द्रसिंह बेड़सा बताते हैं की श्रीफल गणपति निर्माण के निर्णय पर्यावरण के लिए हितकारी और अनुज़्रणीय है। श्रीफल भारतीय सस्क्र्ती में सबसे शुद्ध और पवित्र माना गया है। इसके गणपति के निर्माण और विसर्जन से एज़ तरफ जहां संबंधित जलाशय ज़ पानी प्लास्टर ऑफ पेरिस व हानिज़रज़ रासायनिक रंगों की प्रतिमाओं के विसर्जन से प्रदूषित होने से बच जाता है वहीं प्रतिमा विसर्जन के बाद पानी की सतह पर आने वाले श्रीफल किसी श्रद्घालु के लिए प्रसाद रूप में प्राप्त होंगे काबिज जलाशय के कीज़्नारे आने के बाद यह श्रीफल अकुरित हो नए पेड़ बन सकेगे। बेड़सा के अनुसार इस प्रकार की परिपाटी वागड़ अंचल के जलाशयों व पर्यावरण के लिए बेहद लाभदायक है और गत वर्षों में वागड़ में इस विषय पर आई जाग्रति आई है जो की भविष्य के लिए सुखद सकेत है।
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