सहरा में बढ़े भूजल को लेकर समझ: शम्मा बानो
बाड़मेर
रेतीले इलाके बाड़मेर में जिस प्रकार से जल का दोहन और पेड़ों की अवैध कटाई व अवैध खनन हो रहा है, आने वाले समय में पर्यावरण व पेयजल संकट और गहराएगा। कई हिस्सों में पेयजल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जा रहा है। इससे कई स्थानों पर पेयजल संकट ब़ रहा है। जल के उपयोग को लेकर ग्रामीणों में जागरूकता ब़ानी होगी यह कहना है चोहटन प्रधान शम्मा बानो का। उन्होंने यह बात भूजल संरक्षण व पानी के उपयोग को लेकर बुधवार को चोहटन पंचायत सभागार में जन स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग,सी सी डी यू ,भूजल विभाग और जागर्ति जन सेवा संस्थान नागोर द्वारा आयोजित कार्यशाला में कही. उन्होंने कहा कि इस बारे में कानून सख्त बनाया जाए और उसके अनुपालन पर जोर दिया जाए। उन्होंने माना कि राजस्थान के अरावली श्रृंखलाओं में भूजल दोहन अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सबसे ज्यादा हो रहा है। ऐसे में अरावली से दूर बसे बाड़मेर में भी के लिए समस्याएं ब़ेंगी । प्रदेश के चुनिंदा इलाकों में सिंचाई के लिए भूजल के अत्यधिक दोहन ने पीने के पानी की समस्या पैदा कर दी है। इन इलाकों में सिंचाई के जरिए अत्यधिक भूजल दोहन से नलकूप, कुएं और बावड़ी जैसे जलस्रोत सूख गए है । जल एवं स्वछता मिशन राजस्थान सरकार , पेयजल गुणवता मिशन सी सी डी यू के आई ई सी कंसल्टेंट अशोक सिंह राजपुरोहित ऩे बताया कि राज्य भर में भूजल कार्यशालाओ का आयोजन करवाया जा रहा है .कार्यशाला का उद्देश्य राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल के प्रति शासकीय विभागों एवं पंचायती राज संस्था के सदस्यों की संवेदनशीलता वृदि्घ करने के साथ गिरते भूजल पर सोच को गंभीर करना था।उसी क्रम में बाड़मेर जिले में जन स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग,सी सी डी यू ,जागर्ति जन सेवा संस्थान नागोर द्वारा हर ब्लाक पर भूजल के विषय पर कार्यशालाओ का आयोजन किया जा रहा है .जिसके तहत बाड़मेर के चोहटन कार्यशाला को संबोधित करते हुए उपखंड अधिकारी चोहटन ने कहा कि पुनर्भरण योजना अंतर्गत स्टॉपडेम, तालाब, गड्े व रोक बाँध आदि बनाकर जल का पुनर्भरण किया जा सकता है। ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में वर्षाकाल में छत के पानी को भूमि में पहुँचाकर भूमिगत जलस्तर ब़ाना होगा। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इस मोके पर चोह्टन इकव लाधू राम विश्नोई ऩे कहा कि जल संरक्षण में सामान्य जनमानस का सहयोग जरूरी है। ग्राम पंचायत में विद्युत प्रदाय बंद होने पर जल संकट का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण अंचलों में हैंडपंपों व कुओं के आसपास सफाई रखना चाहिए। ग्रामीण पेयजल स्रोतों के पास ही कपड़े धोते व पशुओं को पानी पिलाते हैं।इस मोके पर भूजल विभाग के भूजल वैज्ञानिक ए पी माथुर ने राज्य भर में पानी के मुद्दे पर सरकार गंभीरता से प्रयास कर रही है और हर जगह की अवाम को इस मुद्दे से जोड़ रही है शहर और गावो में भूजल रिचार्ज करने के लिए घरों में वाटर हार्वेस्टिंग बनाकर भूजल का स्तर ब़ाया जा सकता है। अभी शहर में हालात यह हैं कि नलकूप खोदने पर 00 फीट तक भी पानी नहीं आता है। वाटर हार्वेस्टिंग का लेकर नियमों में हुए बदलाव से शहर में बनने वाले 300 वर्गमीटर से बड़े भवन पर अब वाटर हार्वेस्टिंग बनाना अनिवार्य हो चुका है।सरकारी भवनों के नवीन निर्माण में वाटर हार्वेस्टिंग लगाने का प्रावधान बजट में ही किया है। लगातार गिरते भू जल स्तर को देखते हुए बरसाती पानी को बचाने की कवायद की दिशा में सरकार ने वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया है। कई सरकारी भवनों अभी भी यह सिस्टम नहीं बना है। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2009 में लागू हुए राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम में मानदंडों का निर्धारण किया गया है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 3 लीटर पेयजल, 5 लीटर खाना बनाने, स्नान के लिए 15 लीटर, घर धोने के लिए 7 लीटर व शौच के लिए 10 लीटर पानी दिया जाना है। आज जेसा भूजल दोहन जारी रहा तो 15 साल बाद तो और भी भयावह हालात होंगे। वैज्ञानिकों ने बताया कि बाड़मेर के कई क्षेत्र डार्क जोन में आता है। इसके बावजूद हम 138 फीसदी भूजल का दोहन कर रहे हैं। इसकी तुलना में भूजल पुनर्भरण नहीं हो रहा। चेतावनी दी गई है कि भूजल संरक्षण पर गंभीरता नहीं बरती, तो 15 साल बाद भूजल भंडार ही खत्म हो जाएंगे। जल संग्रहण जरूरी है। इसके लिए बारिश के पानी को व्यर्थ बहने से रोकने के साथ फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाना होगा। सभी को जागरूक होकर पानी बचाना होगा। कार्यशाला पेयजल गुणवत्ता का महत्व एवं पेयजल प्रदूषण से होने वाले रोग, पेयजल स्त्रोतो को प्रदूषणों को मुक्त रखने के उपायों, ग्राम पेयजल सुरक्षा आदि पर चर्चा हुई।
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