प्रधान ने कही बेबाक बात ... 
आम तोर पर सरकारी आदेशो पर होने वाले आयोजन हें लोग दूर भागने का सोचते है लेकिन भूजल संरक्षण व पानी के उपयोग को लेकर बुधवार को चोहटन पंचायत सभागार में जन स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग,सी सी डी यू ,भूजल विभाग और जागर्ति जन सेवा संस्थान नागोर द्वारा आयोजित भूजल कार्यशाला में चोहटन प्रधान शम्मा बानो बड़ी बेबाकी से सरकारी अधिकारियो से इस मुद्दे पर विचार करती नजर आई . एक तरफ जहा उन्होंने भूजल विभाग के अधिकारियो से पूरे चोहटन ब्लोक के मुजुदा भूजल स्तर के बारे में जानकारी ली वही दूर ग्रामीण इलाके से आये लोगो से भी इस मसले पर राय मशवरा किया . उन्होंने कहा कि शहर समेत जिलेभर में भूजल स्तर नीचे जा रहा है। जिले में वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए खासे इंतजाम नहीं हो सके हैं। ऐसे में लोगों को पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। जिलेभर में भूगर्भीय जल स्तर गिरने से जलसंकट गहराने का दंश झेलने के बावजूद वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को प्रभावी बनाना मुमकिन नहीं हुआ। जल संसाधन महकमे ने एनिकट बनाकर जल संरक्षण की दिशा में कुछ प्रयास किए, लेकिन जिले में बारिश का पानी सहजने के प्रभावी उपाय नहीं हो पाए। जलदाय विभाग ने कुछेक सरकारी भवनों से वर्षा का पानी एकत्रित करने के लिए कार्य योजना लागू की है। जल प्राप्ति के मूलतः दो स्रोत हैं भूजल और सतह का जल. अधिकांश जलापूर्ति भूमिगत माध्यम द्वारा होती है. भूजल वह महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसे जल का अनंत भंडार समझकर आमजन से लेकर सरकारी मशीनरी तक इसका इस कदर दोहन करती रही है कि आज देश के बड़े हिस्से में भूजल का स्तर लगातार नीचे जाने से न केवल जलसंकट पैदा हो गया है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र भी असंतुलित हो रहा है. देश में चालीस के दशक में प्रति व्यक्ति 5,277 घन मीटर जल उपलब्ध था जो अब घटकर 1869 घनमीटर से भी कम रह गया है.उन्होंने कहा कि 1992 में सिंचाई आयोग की स्थापना के समय सतह के जल और भूजल में कोई भेद नहीं किया गया. तत्कालीन लक्ष्य था अधिक से अधिक सिंचित क्षेत्र का विस्तार. गौरतलब है कि पूरे देश के भूजल का अस्सी प्रतिशत उपयोग कृषि हेतु होता है और सब्सिडी पर मिलने वाली सस्ती बिजली के चलते कृषक उसका अंधाधुंधदोहन कर ऐसे संकट को आमंत्रित कर रहे हैं, जिससे कालांतर में उबरना मुश्किल होगा. भूजल चूंकि सार्वजनिक संपत्ति घोषित नहीं है इसलिए निजी क्षेत्र में भी हजारों नलकूप और कुएं खोदे जा रहे हैं.वर्षाजल का देश में समुचित उपयोग और संरक्षण नहीं हो पाता. वर्षा और हिमपात से वर्षभर पानी की कुल उपलब्धता लगभग 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर हो जाती है. इसमें से लगभग सा़े 11 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी नदियों में बह जाता है. सात करोड़ हेक्टेयर मीटर जल वाष्प बन उड़ जाता है और लगभग 12 करोड़ हेक्टेयर मीटर को धरती सोख लेती है. ऐसे में दो ही रास्ते हैं पहला वर्षा जल का 'रुफ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग' के माध्यम से जल संरक्षण करना और दूसरा जल स्रोतों के दोहन, पुनर्भरण और उपयोग के लिए कानूनी प्रावधान. कानून में जल दोहन और जल उपयोग के तौरतरीके भी नियमबद्ध होने चाहिए.

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