चौंकाने वाली खबर...
सोने के प्रति भारतीयों के लगाव को लेकर उद्योग एवं वाणिज्य संगठन एसोचैम ने चिंता जताई है। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट में एसोचैम ने खुलासा किया है कि सोने के प्रति बढ़ते लगाव के चलते भारत को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो नुकसान काफी बढ़ सकता है। आर्थिक प्रगति की रफ्तार ढीली पडने और ऊंची कीमतों के बावजूद सोने को लेकर भारतीयों का लगाव कम नहीं हो रहा है। गत तीन वर्षों में तो सोने का आयात औसतन 26.8 प्रतिशत की दर से बढा है।उद्योग एवं वाणिज्य संगठन एसोचैम ने सोने के आयात पर केंद्रित एक रिपोर्ट में कहा कि देश के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी वर्ष 2010-11 में बढकर 9.6 प्रतिशत हो गयी जबकि वर्ष 2001-02 में यह 8.1 प्रतिशत पर थी।खास तौर पर वर्ष 2008 से सोना आयात में खास तेजी देखी जा रही है। वर्ष 2008-09 में सोने का आयात 23 फीसदी बढा था जबकि 2009-10 में यह 38.1 प्रतिशत की दर से बढा था। पिछले वित्त वर्ष में सोने के आयात की वृद्धि दर 18.3 प्रतिशत रही। इस तरह वैश्विक आर्थिक मंदी के सिर उठाने के बाद से सोने के आयात में औसतन 26.8 फीसदी का उछाल देखा गया।एसोचैम का कहना है कि भारतीयों के दिल में अब भी सोने को लेकर पुराना प्रेम बरकरार है लेकिन सोने के उत्पादक संपत्ति नहीं होने के कारण अर्थव्यवस्था को आगे बढने में इससे कोई मदद नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा सोने के आयात पर कच्चे तेल के आयात के बाद सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भी खर्च हो रही है।
स्थिति यह है कि दुनिया में सोने की एक तिहाई मांग भारत से ही पैदा होती है। वैश्विक स्तर पर सोने की खरीद के मामले में भारत चीन से भी आगे है और अपनी विदेशी मुद्रा का बहुत बडा हिस्सा इस पर खर्च कर देता है। लेकिन भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चीन के विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का महज 8.81 फीसदी ही है।एसोचैम ने आर्थिक नजरिए से अनुत्पादक सोने की मांग को कम करने के लिए सरकार से आकर्षक वित्तीय विकल्प मुहैया कराने का अनुरोध किया है। देश के महज 21 फीसदी ग्रामीण आबादी तक ही बैंकों की सीधी पहुंच होने से लोग सोने के वित्तीय विकल्पों का फायदा नहीं उठा पाते हैं। इसके बारे मे सरकार को जागरूकता अभियान भी चलाना चाहिए।
सोने के प्रति भारतीयों के लगाव को लेकर उद्योग एवं वाणिज्य संगठन एसोचैम ने चिंता जताई है। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट में एसोचैम ने खुलासा किया है कि सोने के प्रति बढ़ते लगाव के चलते भारत को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो नुकसान काफी बढ़ सकता है। आर्थिक प्रगति की रफ्तार ढीली पडने और ऊंची कीमतों के बावजूद सोने को लेकर भारतीयों का लगाव कम नहीं हो रहा है। गत तीन वर्षों में तो सोने का आयात औसतन 26.8 प्रतिशत की दर से बढा है।उद्योग एवं वाणिज्य संगठन एसोचैम ने सोने के आयात पर केंद्रित एक रिपोर्ट में कहा कि देश के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी वर्ष 2010-11 में बढकर 9.6 प्रतिशत हो गयी जबकि वर्ष 2001-02 में यह 8.1 प्रतिशत पर थी।खास तौर पर वर्ष 2008 से सोना आयात में खास तेजी देखी जा रही है। वर्ष 2008-09 में सोने का आयात 23 फीसदी बढा था जबकि 2009-10 में यह 38.1 प्रतिशत की दर से बढा था। पिछले वित्त वर्ष में सोने के आयात की वृद्धि दर 18.3 प्रतिशत रही। इस तरह वैश्विक आर्थिक मंदी के सिर उठाने के बाद से सोने के आयात में औसतन 26.8 फीसदी का उछाल देखा गया।एसोचैम का कहना है कि भारतीयों के दिल में अब भी सोने को लेकर पुराना प्रेम बरकरार है लेकिन सोने के उत्पादक संपत्ति नहीं होने के कारण अर्थव्यवस्था को आगे बढने में इससे कोई मदद नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा सोने के आयात पर कच्चे तेल के आयात के बाद सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भी खर्च हो रही है।
स्थिति यह है कि दुनिया में सोने की एक तिहाई मांग भारत से ही पैदा होती है। वैश्विक स्तर पर सोने की खरीद के मामले में भारत चीन से भी आगे है और अपनी विदेशी मुद्रा का बहुत बडा हिस्सा इस पर खर्च कर देता है। लेकिन भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चीन के विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का महज 8.81 फीसदी ही है।एसोचैम ने आर्थिक नजरिए से अनुत्पादक सोने की मांग को कम करने के लिए सरकार से आकर्षक वित्तीय विकल्प मुहैया कराने का अनुरोध किया है। देश के महज 21 फीसदी ग्रामीण आबादी तक ही बैंकों की सीधी पहुंच होने से लोग सोने के वित्तीय विकल्पों का फायदा नहीं उठा पाते हैं। इसके बारे मे सरकार को जागरूकता अभियान भी चलाना चाहिए।

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