तीन साल में प्रदेश से 1500 बच्चे गायब
जयपुर। राजस्थान से पिछले तीन साल में पंद्रह सौ से भी ज्यादा बच्चे गायब हुए हैं। इनमें 600 से भी ज्यादा लड़कियां शामिल हैं। साल 2009 के जनवरी महीने से साल 2011 के अंतिम महीने तक राजस्थान के जिलों से 1503 बच्चे गुम हुए हैं। इन बच्चों की उम्र दो साल से लेकर पंद्रह साल के बीच तक है। सबसे ज्यादा लापता जयपुर से हुए हैं।
जयपुर से सबसे ज्यादा बच्चे गुम
पुलिस रिकार्ड्स के अनुसार जयपुर से 288 बच्चे गुम हुए हैं। उसके बाद अलवर से 92, चित्तौड़ से 96, कोटा से 137, अजमेर से 54, बांसवाड़ा से 22, भीलवाड़ा से 44, धौलपुर से 35, हनुमानगढ़ से 31, झाालवाड़ से 35, प्रतापगढ़ से 2, बांरा से 75, बाडमेर से 10, भरतपुर से 15, बीकानेर से 3, डूंगरपुर से 23, जैसलमेर से 4, करौली से 10, राजसमंद से 83, बूंदी से 41, चुरू से 24, दौसा से 10, गंगानगर से 35, जालोर से 12, पाली से 10, नागौर से 20, सीकर से 10, सिरोही से 19, टोंक से 14, उदयपुर से 52 और जोधपुर से 26 बच्चे बीते दो साल में गुम हुए हैं। इनमें से कुछेक ही परिजनों के प्रयास से मिल सके हैं।
30 फीसदी बच्चों की तो फोटो तक नहीं
गुम हुए इन बच्चों के बारे में पुलिस की कार्रवाई बेहद ही निराशाजनक रही है। तीन साल में गुम हुए पंद्रह सौ बच्चों में से करीब तीस फीसदी बच्चों की तो फोटो तक पुलिस रिकाड्र्स में नहीं है। करीब बीस फीसदी बच्चों की फोटो उनकी उम्र से काफी पहले की है, जिनसे उनकी तलाश करना ही मुश्किल है। हालांकि, पुलिस की जिम्मेदारी बनती है कि हर गुम व्यक्ति के बारे में पंफलेट छपवाए और आसपास के इलाकों में बंटवाए, उनके परिजनों से संपर्क में रहें और गुम व्यक्ति के मिलने की हर संभावित जगह पर परिजनों के साथ दबिश दे लेकिन गुम हुए लोगों के बारे में पुलिस सिर्फ गुमशुदगी दर्ज कर अपने हाथ खींच लेती है।
जयपुर। राजस्थान से पिछले तीन साल में पंद्रह सौ से भी ज्यादा बच्चे गायब हुए हैं। इनमें 600 से भी ज्यादा लड़कियां शामिल हैं। साल 2009 के जनवरी महीने से साल 2011 के अंतिम महीने तक राजस्थान के जिलों से 1503 बच्चे गुम हुए हैं। इन बच्चों की उम्र दो साल से लेकर पंद्रह साल के बीच तक है। सबसे ज्यादा लापता जयपुर से हुए हैं।
जयपुर से सबसे ज्यादा बच्चे गुम
पुलिस रिकार्ड्स के अनुसार जयपुर से 288 बच्चे गुम हुए हैं। उसके बाद अलवर से 92, चित्तौड़ से 96, कोटा से 137, अजमेर से 54, बांसवाड़ा से 22, भीलवाड़ा से 44, धौलपुर से 35, हनुमानगढ़ से 31, झाालवाड़ से 35, प्रतापगढ़ से 2, बांरा से 75, बाडमेर से 10, भरतपुर से 15, बीकानेर से 3, डूंगरपुर से 23, जैसलमेर से 4, करौली से 10, राजसमंद से 83, बूंदी से 41, चुरू से 24, दौसा से 10, गंगानगर से 35, जालोर से 12, पाली से 10, नागौर से 20, सीकर से 10, सिरोही से 19, टोंक से 14, उदयपुर से 52 और जोधपुर से 26 बच्चे बीते दो साल में गुम हुए हैं। इनमें से कुछेक ही परिजनों के प्रयास से मिल सके हैं।
30 फीसदी बच्चों की तो फोटो तक नहीं
गुम हुए इन बच्चों के बारे में पुलिस की कार्रवाई बेहद ही निराशाजनक रही है। तीन साल में गुम हुए पंद्रह सौ बच्चों में से करीब तीस फीसदी बच्चों की तो फोटो तक पुलिस रिकाड्र्स में नहीं है। करीब बीस फीसदी बच्चों की फोटो उनकी उम्र से काफी पहले की है, जिनसे उनकी तलाश करना ही मुश्किल है। हालांकि, पुलिस की जिम्मेदारी बनती है कि हर गुम व्यक्ति के बारे में पंफलेट छपवाए और आसपास के इलाकों में बंटवाए, उनके परिजनों से संपर्क में रहें और गुम व्यक्ति के मिलने की हर संभावित जगह पर परिजनों के साथ दबिश दे लेकिन गुम हुए लोगों के बारे में पुलिस सिर्फ गुमशुदगी दर्ज कर अपने हाथ खींच लेती है।
पुलिस को सौंपी थी पूरी जिम्मेदारी
राजस्थान हाइकोर्ट के अधिवक्ता गणेश मीणा ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य से लापता हुए करीब सात हजा बच्चों के बारे में एक पूरा रिकार्ड हाइकोर्ट में पेश किया था। उस पर हाइकोर्ट ने लापता बच्चों की जांच करने वाले अधिकारियों को सामान्य कार्यो से अलग रखने के निर्देश दिए थे। साथ ही एडीजी क्राईम के नेतृत्व में तीन अधिकारियों की मॉनीटरिंग टीम भी बनाई थी, जिसे समय-समय बैठक करके मामलों की समीक्षा करनी थी लेकिन इस कमेटी की समीक्षा कितनी काम आ रही है, यह बात लगातार गुम हो रहे बच्चों के आंकड़े में वृद्घि होने से ही समझी जा सकती है।
राजस्थान हाइकोर्ट के अधिवक्ता गणेश मीणा ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य से लापता हुए करीब सात हजा बच्चों के बारे में एक पूरा रिकार्ड हाइकोर्ट में पेश किया था। उस पर हाइकोर्ट ने लापता बच्चों की जांच करने वाले अधिकारियों को सामान्य कार्यो से अलग रखने के निर्देश दिए थे। साथ ही एडीजी क्राईम के नेतृत्व में तीन अधिकारियों की मॉनीटरिंग टीम भी बनाई थी, जिसे समय-समय बैठक करके मामलों की समीक्षा करनी थी लेकिन इस कमेटी की समीक्षा कितनी काम आ रही है, यह बात लगातार गुम हो रहे बच्चों के आंकड़े में वृद्घि होने से ही समझी जा सकती है।

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