पर्युषण महापर्व का चोथा दिन, भगवान महावीर जन्म वांचन शुक्रवार को
बाड़मेर। थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में प्रखर व्याख्यात्री मधुरभाषी साध्वीवर्या श्री प्रियरंजनाश्रीजी म.सा. ने पयुर्षण महापर्व के चैथे दिन विशाल धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए अपने प्रवचन में कहा कि परमात्मा बनना जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है पर यह उपलब्धि आसान नहीं हैं इसके लिये बहुत तपना होता हैं अत्यन्त उत्कृष्ट साधना के बल पर ही यह सिद्धि पायी जा सकती है परमात्मा महावीर का नाम आज हर जुंबा पर है पर यह काम पाने के लिये महावीर को इस जन्म के पहले के जन्मों में भी खूब तपना पड़ा है। उन्होने कहा आत्मा अनादिकाल से संसार में भटक रही हैं पर जब से वह सम्यक्त्व प्राप्त करती है तभी से उसकी भवसंख्या गिनी जाती है। सम्यक्त्व प्राप्त करने के पश्चात 27 वे भव में भगवान महावीर बने है। इससे पूर्व चक्रवर्ती एवं वासुदेव भी बने। उन्होने 25 वें भव में वीसस्थानक के तप की तपस्या की ओर उसी के प्रभाव से उन्होने तीर्थकर बनने की अर्हता प्राप्त की।
जगत के लिये भगवान महावीर ने महत्वपूर्ण बात कही है वह है क्षमा इससे अशान्ति को शान्ति में बैर को प्रेम में बदला जा सकता है इससे दुनिया की समस्त समस्या का समाधान हो सकता है पर्युषण पर्व आत्मालोकन करने एवं अपने भीतर बुराईयों को दूर करने का अवसर देता है।
साध्वी श्री ने कहा कि उदयन राजा, सुदर्शन, कामदेव आदि ने इस प्रकार की आराधना करके आत्म कल्याण किया है। पर्युषण महापर्व के 5 कत्र्तव्य, वार्षिक 11 कत्र्तव्य और दैनिक 6 कत्र्तव्यों का ज्ञान हो जाये, तो आत्मा आत्मिक उत्थान करे। इस दृष्टि से आज तीसरे दैनिक कत्र्तव्यों के ऊपर भी प्रवचन होता है। इससे धर्मी आत्मा अपने कत्र्तव्य का विधिपूर्वक पालन करके अनंत सुख की भोक्ता बनती है। हम पाप करके भवयात्रा कर रहे हैं। हमें अब धर्मयात्रा करके मोक्षयात्रा करनी है।
साध्वी डाॅ. दिव्यांजनाश्री ने कहा कि सांसारिक आत्मायें खाना-पीना-कमाना इत्यादि प्रवृत्तियों को खुशी से करती हैं। धर्म साधना की ओर तो उसकी दृष्टि ही नहीं जाती। किन्तु कभी ऐसी परिस्थिति खड़ी हो जाती है जिसके कारण उसे धर्म की ओर मुड़ना ही पड़ता है। अनांत मनुष्य धर्म की शरण में जाता है। परन्तु मनुष्य को सुख में भी धर्म करना चाहिये। इसलिये कवि ने कहा है कि ‘दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोय, जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय’। धर्म आत्मा का हितकारी होने से सुख में भी किया जाना चाहिये।
साध्वी प्रियशुभांजनाश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि आज का मानव आत्मा की अपेक्षा शरीर को ज्यादा महत्व दे रहा है। शरीर में रोग आदि उत्पन्न होते हैं। तब तो तुरंत डाॅक्टर के पास ईलाज कराने के लिये दौड़ता है। मगर आत्मा में क्रोध, अहंकार आदि आत्मिक बीमारियों के ईलाज कराने की वह अपेक्षा करता है। अज्ञानी मानव यह नहीं समझता कि शरीर से ईलाज कराने की ज्यादा होता है। शरीर तो पर्स के समान है, आत्मा उसके अंदर रहे हुए कि हीरों के समान है। हीरों का मूल्य ज्यादा होता है जबकि पर्स का कम। जब तक कि आत्मा शरीर में रहती है तब तक ही लोग दवाई आदि के लिये लाखों रूपये खर्च करते हैं। आत्मा चली जाने पर शरीर को जलाकर राख कर देते हैं। अरे! आत्मा के शरीर के लिये लाखों रूपये खर्च कर देते हैं। वे सब आत्मा के कारण ही खर्च करते हैं तो आत्मा का हितकारी धर्म मनुष्य को दुःख और सुख में भी करना चाहिये।
आज कल्पसूत्र वांचन में पांच वांचना का वांचन हुआ। उसमें दस आश्चर्य एवं माता त्रिशला के चैदह स्वप्न- हाथी, ऋषभ, सिंह, लक्ष्मी, पुष्पमाला, चन्द्र, सूर्य, ध्वजा, पूर्ण कलश, पद्म सरोवर, खीर समुद्र, देव विमान, रत्नों की राशि, निर्गम अग्नि आदि का वर्णन तथा परमात्मा महावीर के 27 भवों का वर्णन किया।
परमात्मा महावीर का जन्म वांचन आज-
खरतरगच्छ जैन श्री संघ के अध्यक्ष मांगीलाल मालू, उपाध्यक्ष भूरचन्द संखलेचा एवं महामंत्री नेमीचन्द बोथरा ने बताया कि स्थानीय आराधना भवन में दोपहर 2 बजे भगवान महावीर जन्म वांचन होगा। पूज्य साध्वीवर्या के सानिध्य में जन्म वांचन के समय सिद्धार्थ महाराजा, रानी त्रिशला देवी, प्रियवंदा दासी एवं छड़ीदार आदि के द्वारा राजदरबार सुसज्जित एवं सुंदर प्रस्तुति होगी।
दिनांक 06 सितम्बर को महावीर स्वामी जन्म वाचन एवं सपनों की बोलियां होंगी। दिनांक 09 सितम्बर को मूल कल्पसूत्र वाचन, क्षमापना व आत्मशुद्धि का महान् पर्व संवत्सरी महापर्व मनाया जायेगा एवं सायं 4 बजे संवत्सरी प्रतिक्रमण का आयोजन किया जायेगा। प्रतिदिन प्रातः 9 से 11 बजे तक एवं दोपहर 2 से 4 बजे तक कल्पसूत्र पर प्रवचन एवं रात्रि में भक्ति संध्या का कार्यक्रम आयोजित होगा। आज आराधना भवन में आदिनाथ, पाश्र्वनाथ, दादा गुरूदेव की प्रतिमाओं पर भव्य आंगी रचना की गई। इस अवसर पर मांगीलाल मालू, भूरचन्द संखलेचा, नेमीचन्द बोथरा, जगदीश बोथरा, बंशीधर बोथरा, बाबुलाल छाजेड़, सोहनलाल संखलेचा, बाबुलाल तातेड़, केवलचन्द संखलेचा, ओमप्रकाश भंसाली, गौतमचन्द डूंगरवाल, केवलचन्द भंसाली, खेतमल तातेड़, पुजारी गोविंद, उदय गुरू उपस्थित थे।
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