पर्युषण महापर्व का दूसरा दिन, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब 
बाड़मेर। 
थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में प्रखर व्याख्यात्री साध्वीवर्या श्री प्रियरंजनाश्रीजी म.सा. ने पयुर्षण महापर्व के दूसरे दिन अपने प्रवचन में कहा कि अपनी आत्मा को पर्व की आराधना में भीगा देना है। पर्व के दिनों में कौनसी आराधना करने से आत्मा भीगती है? तो महर्षियों ने कहा कि यदि हम खाने-पीने की लोलुपता में मस्त बने रहे, शरीर का श्रृंगार करने में व्यस्त बने रहे, वासनाओं का पाप चालू रहे तो आराधना-साधना कैसे हो सकती है? इसलिये पर्व व महापर्व में पौषध की आराधना करनी चाहिये। पौषध यानि जिससे धर्म का पोषण हो। पर्युषण महापर्व है, इसमें पौषध करना चाहिये। कम से कम संवत्सरी को अवश्य करना चाहिये। जिस प्रकार मार्च महीने का अंतिम सप्ताह आता है तब सभी व्यापारी अपना अकाउण्ट व्यवस्थित कर लेते हैं, डेबिट एवं क्रेडिट में कोई गलती रह गई हो तो उस रकम को ठीक ढंग से व्यवस्थित कर देते हैं एवं अगले वर्ष का अंदाज-पत्र तैयार करते हैं। उसी प्रकार पर्युषण वार्षिक पर्व होने से आत्मा वार्षिक 11 कत्र्तव्यों में से कोई एकाध कत्र्तव्य बाकी रह गया हो, तो उसे इस महापर्व के दौरान सप्ताह भर में पूर्ण कर देती है और अगले वर्ष हेतु वार्षिक कत्र्तव्यों का अंदाज-पत्र तैयार कर लेती है। कैमरे के लैंस पर धूल गिर गई हो तो छाया चित्र सुव्यस्थित नहीं आते। कपड़े की झपट से हटाने से ही छाया चित्र निखरेगा। अपनी आत्मा आलस्य की धूल से ग्यारह कत्र्तव्य पालन में शिथिल बन गई हो, तो ग्यारह वार्षिक कत्र्तव्य सम्पन्न करने में उसे कटिबद्ध बना लें। आत्मा वर्ष के दौरान तन-मन-धन से मोह और ममता से शिथिल बन जाती है। इसलिये ये कत्र्तव्य धन की ममता झाड़ने के लिये है।

साध्वी श्री ने कहा कि संघ पूजन, साधार्मिक भक्ति, यात्रात्रिक, स्नात्र महोत्सव, देव द्रव्य की वृद्धि, महापूजा, रात्रि धर्म जागरण, श्रुतपूजा, उद्यापन, तीर्थ प्रभावना एवं आलोचना से भी कत्र्तव्य हमारे लिये वार्षिक जरूरी हैं। शुद्धि लेने के बाद प्रायश्चित को शीघ्र पूर्ण करना चाहिये।

साध्वी श्री ने कहा कि इन आठ दिनों में आठों कर्मों को तोड़ना है। अष्टसिद्धि की प्राप्ति करना है। आठ का अंक अपने आप में विशिष्ट है। हमें प्रातः उठकर कप दर्शन, दूरदर्शन नहीं करना चाहिये बल्कि प्रभु दर्शन एवं संत दर्शन करना चाहिये। जीवन में सबसे पहली नींव की ईंट के समान अगर कुछ है तो साधार्मिक वत्सल। जिसे साधार्मिक को देखकर आनंद, स्नेह सद्भाव नहीं हो उसके सम्यकत्व में भी संदेह है।

साध्वी श्री ने पर्युषण महापर्व का संदेश देते हुए कहा कि यह समस्त जीवों के प्रति मैत्री भाव है। जैन संस्कृति का सदा उद्घोष रहा है राग से विराग, भोग से त्याग, युक्ति से मुक्ति की ओर जाने का संदेश। यहां शरीर पोषण के स्थान पर आत्म पोषण पर अधिक ध्यान दिया जाता है। पर्युषण पर्व आध्यात्मिकता से आप्लावित है और इसका उतुंग शिखर है- संवत्सरी पर्व। यह पर्व आत्मा के शुद्धिकरण का पर्व है। इसलिये सार्वदेशिक और सार्वकालिक है। इसका दृष्टिकोण अंतर्मुखी है। ब्राह्म चमक दमक, रंग उमंग से परे यह पर्व आत्मिक उत्थान में सहायक है। इस पर्व को सफल बनाने और चरमोत्कर्ष अवस्था में पहुंचने हेतु तीन कार्य करने होते हैं- प्रतिक्रमण, आलोचना एवं क्षमायाचना।

साध्वी डाॅ. दिव्यांजनाश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि कुमारपाल राजा ने साधार्मिक भाईयों के लिये बहुत किया। भरत महाराज ने भी साधार्मिक भक्ति की। पूणिया श्रावक ने अपरिग्रही बनकर साधार्मिक भक्ति की। हमें न्यूज नहीं मिलने से हम फ्यूज हो जाते हैं। परन्तु न्यूज ज्ञान की मिले तो फ्यूज लूज भी हो तो भी टाईट हो जाती है। दुनिया में प्रकाश ट्यूब लाईट का, तारों का, चन्द्रमा का, सूर्य का है। इससे भी बढ़कर केवलज्ञान का प्रकाश है। इस प्रकाश से हमारे जीवन में समकित का दीपक प्रकट करना है।

साध्वी श्री ने कहा कि पर्युषण महापर्व श्रमण संस्कृति काएक अतीव विशिष्ट पर्व है। साधक पर्युषण के पावन दिनों में इसका निरीक्षण करता है कि मैंने किस किसके अन्तर्मानस को आघात पहुंचाया है। अपने दुष्कर्मों पर विचार करने से उसका अन्तर्मन पश्चाताप से भर जाता है। पश्चाताप की अग्नि में उसके चित्त विकार जलने लगते हैं। सच्चे मन से आत्मनिरीक्षण करने पर चित्तशुद्धि ही पर्युषण पर्व का परम लक्ष्य है। संवत्सरी पर्व का प्राणतत्व है क्षमा का आदान-प्रदान।

द्वितीय दादा गुरूदेव श्री मणिधारी जिनचन्द्रसूरीश्वर की पुण्य तिथि आज-

खरतरगच्छ जैन श्री संघ के अध्यक्ष मांगीलाल मालू, उपाध्यक्ष भूरचन्द संखलेचा एवं महामंत्री नेमीचन्द बोथरा ने बताया कि आज द्वितीय दादा गुरूदेव श्री मणिधारी जिनचन्द्रसूरीश्वर की पुण्य तिथि पर गुणानुवाद सभा का आयोजन, दोपहर में पूजा एवं रात्रि 8 बजे आराधना भवन में भक्ति संध्या का आयोजन किया जायेगा। इसी तरह 05 सितम्बर को गोलेच्छा-डूंगरवाल ग्राउण्ड में क्षमामूर्ति अचूंकारी भट्टा विषय पर एक नाटिका का मंचन किया जायेगा। दिनांक 06 सितम्बर को महावीर स्वामी जन्म वाचन एवं सपनों की बोलियां होंगी। दिनांक 09 सितम्बर को मूल कल्पसूत्र वाचन, क्षमापना व आत्मशुद्धि का महान् पर्व संवत्सरी महापर्व मनाया जायेगा एवं सायं 4 बजे संवत्सरी प्रतिक्रमण का आयोजन किया जायेगा।

कल्पसूत्र का वाचन आज, कल्पसूत्र की शोभायात्रा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब-

जैन धर्म का सबसे बड़ा ग्रंथ कल्पसूत्र है। कल्पसूत्र का वाचन बुधवार प्रातः किया जायेगा। पूज्य साध्वीवर्या को कल्पसूत्र वोराने का लाभ रतनलाल केशरीमल संखलेचा परिवार ने लिया। इसी प्रकार पांच ज्ञान की बोलियां बोली गई जिसमें मति ज्ञान एवं श्रुत ज्ञान मुकेशकुमार जेठमल जैन परिवार ने लिया, अवधि ज्ञान का लाभ चम्पालाल हीरालाल मालू परिवार ने, मनपरेव ज्ञान का लाभ बंशीधर केशरीमल संखलेचा परिवार ने, केवल ज्ञान का लाभ ओमप्रकाश तेजमल बोथरा परिवार ने लिया। कल्पसूत्र के लाभार्थी परिवार द्वारा कल्पसूत्र को ढोल ढमाकों के साथ उनके परिवार की महिलाओं द्वारा सिर पर धारण कर मंगल गीत गाते पूज्य साध्वीवर्या के साथ श्रद्धालु लाभार्थी के घर कल्पसूत्र को ले जाया गया। जहां पर पूज्य साध्वीवर्या द्वारा वासक्षेप देकर मंगलाचरण सुनाया गया। इसके बाद लाभार्थी परिवार द्वारा प्रभावना वितरित की गई। कल्पसूत्र के लाभार्थी परिवार के निवास पर रात्रि में भक्ति संध्या का आयोजन किया गया।

आज सुबह कल्पसूत्र के लाभार्थी परिवार द्वारा पूज्य साध्वीवर्या को कल्पसूत्र वोहराया जायेगा। इसके बाद साध्वीवर्या अपने मुखारविंद से कल्पसूत्र का वाचन करेंगे।

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