कर्मसिद्धान्त को समझे बिना धर्म का रहस्य समझ में नहीं आ सकता : मणिप्रभसागर
पालीताना
श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में चल रहे चातुर्मास के आराध्ाकों की विशाल सभा को संबोिध्ात करते हुए पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी महाराज ने कहा- कर्मसिद्धान्त को समझे बिना ध्ार्म का रहस्य समझ में नहीं आ सकता। यहाँ हम सुख दुख, ध्ाोखा, अत्याचार, लाभ हानि, पीडा, विपत्ति, प्रेम, वात्सल्य जो भी प्राप्त करते हैं, वह सब हमारे अपने ही कर्मों का परिणाम है। दूसरा कोई भी व्यक्ति हमें न सुखी कर सकता है, न दुखी कर सकता है। वह हमारे सुख दुख में निमित्त हो सकता है। लेकिन मूल कारण तो हम स्वयं ही है।उन्होंने कहा- परमात्मा महावीर का सिद्धान्त है कि मैं ही अपना ईश्वर हूँ। मैं किसी को दुख देने में निमित्त होता हूँ तो अगले जन्म में दुख पाने का उपाय कर रहा हूँ। इसलिये इस जीवन में हमें बहुत सावध्ाानी के साथ एवं विवेक के साथ जीना चाहिये। क्योंकि हमारी ही कि्रया पलटकर हमारे साथ लागूक होगी।
उन्होंने कहा- ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ महाभारत की यह गाथा इसी दर्शन को अभिव्यक्त कर रही है। जो बातें हमें अच्छी नहीं लगती, वैसा हमेें दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।
उन्होंने कहा- इस जगत में हम जो भेद देखते हैं, उसका कारण कर्म सिद्धान्त ही है। माता पिता के दो लडके हैं। दोनों सगे भाई है। एक ही घर में, एक जैसे वातावरण में, एक ही स्कूल में विद्या प्राप्त करते हैं, परन्तु एक भाई होशियार है, उसकी स्मृति तीव्र है, वह बुद्धिमान् है। जबकि दूसरा भाई पढाई में कमजोर है। ऐसा भेद किस कारण है! इसका उत्तर खोजने के लिये हमें परमात्मा महावीर की देशना से साक्षात्कार करना होगा। भगवान् महावीर की वाणी कहती है कि उसने पूर्व भव में ज्ञानावरणीय कर्म का बंध्ा कर रखा है, इस कारण उसकी बुद्धि तीव्र नहीं है। जिसने कर्म का बंध्ा कम कर रखा है, उसकी बुद्धि तीव्र होती है।
उन्होंने कर्म की व्याख्या करते हुए कहा- जो हमारे ज्ञान को रोके, वह कर्म है। जो हमें हमारी आत्मा के खजाने से दूर ले जाये, वह कर्म हैै। जो हमारी अनन्त शक्ति को रोके, वह कर्म है। कर्म का बंध्ान हम स्वयं ही अपने आचरण से, अपने विचारों से, अपनी भाषा से, अपनी प्रवृत्तियों से करते हैं।
चातुर्मास की प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने दोपहर के विशेष प्रवचन में कहा- मैं शरीर नहीं, आत्म स्वरूप हूँ। अपने आत्म स्वरूप का बोध्ा करना ही परमात्म पद को पाना है। हमारी समस्त साध्ाना अपने परम पद को पाने के लिये हैं।
लूणिया व दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास आराध्ाना उत्सव के अन्तर्गत प्रवचन फरमाते हुए उन्होंने कहा- मंजिल तब दूर होती है, जब पथिक आलसी हो जाता है। जो पथिक पुरूषार्थ शील होता है, उसके लिये मंजिल निकट होती है।
चल रही तपस्या के अन्तर्गत आज सिद्धि तप की दूसरी सीढी के प्रत्याख्यान करवाये गये। शत्रुंजय तप, विहरमान तप आदि विविध्ा चल रहे तपस्या में बडी संख्या में श्रद्धालु जुडे हैं। 11 उपवास के तपस्वी श्री पी. सी. जैन का हार्दिक अभिनंदन किया गया। तलेटी की प्रात:कालीन यात्रा में वरघोडा निकाला गया।

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