इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है- साध्वी प्रियरंजनाश्री
बाड़मेर। 
थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में प्रखर व्याख्यात्री साध्वीवर्या श्री प्रियरंजनाश्रीजी म.सा. ने चातुर्मास के उनलालीसवें दिन अपने प्रवचन में कहा कि सूरज पूरब की ओर उदित होता है और उसी क्षण से ही पश्चिम की ओर अपनी यात्रा की शुरूआत कर लेता है। इसी तरह मनुष्य जन्म लेता है और जन्म पाते ही मृत्यु की ओर अपने पांव में होता है। अनित्यता का पाठ वह जन्म के साथ ही पढ़ना शुरू कर देता है। जहां जीवन है, वहां मृत्यु भी है। जहां दुःख है वहां सुख भी है, जहां सफलता है वहां निष्फलता भी है। इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। बगीचे में भंवरे की की जो गुनगुनाहट आप सुन रहे हैं, वह भी कुछ समय तक ही है। जो फूल आज खिले हैं वे कल मुरझा जायेंगे। एक दिया जलता है उसे देखकर हर आदमी सोचता है कि दिया जल रहा है। इसका एक पक्ष और भी है कि जल रहा दिया प्रतिपल बुझता चला जा रहा है। लौ पैदा हुई, आगे बढ़ी और बढ़ने के साथ ही खत्म भी हो गई। लौ का एक तांता जरूर लगा रहता है।
साध्वी श्री ने कहा कि आदमी को जिंदगी में कदम-कदम पर ठोकरें खाने को मिलती है। उसे मृत्यु का दर्शन भी होता है, लेकिन आदमी न जागता है न संभलता है। दुनिया का यह सबसे बड़ा सत्य है कि ठोकरें खाने के बाद भी आदमी को सच्ची समझ नहीं आती। लगना अनुभव है और जो व्यक्ति ऐसा अनुभव पाकर भी नहीं संभलता उससे बड़ा बुद्धू इस दुनिया में कोई और नहीं है।
मनुष्य का पहला धर्म यही है कि जिनके साथ वह अपनी जिंदगी को साधे, उनके बीच रहते हुए भी जिंदगी में लगने वाली ठोकरों से जागे, उनसे अनुभव पाये, समझ को परिपक्व बनाये। उस अनुभव के ज्ञान को ही असली ज्ञान और सम्यक् ज्ञान समझो। जब तक संसार मीठा, मधुर और सुंदर लग रहा है वहां तक उसमें से छूटने की इच्छा नहीं होगी। ज्ञानी कहते हैं कि यह संसार स्वार्थमय है। एक ही मां के दो पुत्र हैं। एक बड़ा बेटा होशियार है और खूब धन कमाता है, दूसरा बेटा कमजोर है वह धन कमाने में पीछे था। कई बार तो दुर्भाग्य के कारण छोटा बेटा नुकसान भी कर देता है। कहने के लिये तो एक ही मां के वे दो बेटे हैं, परन्तु उन दोनों के प्रति मौके व्यवहार में काफी अंतर नजर आता है। बड़े बेटे को वह खूब प्रेम देती है, उसका हर तरह से ख्याल रखती है। जबकि छोटे के प्रति विशेष कुछ भी नहीं। वास्तव में मां के व्यवहार में भी स्वार्थ की बदबू ही थी। एक ग्वाला गायों को घास डालता है परन्तु कुछ गायों को हरी घास खिला रहा है और कुछ गायों को सूखी घास। जिसे हरी घास खिलाता है उसमें भी ग्वाले का स्वार्थ है। जिन वृक्षों पर फल आते हैं, माली उन वृक्षों की अच्छी देखभाल करता है। परन्तु जिस वृक्ष पर फूल नहीं आते, माली उनकी जरा भी परवाह नहीं करता है क्योंकि यहां दुनिया मे स्वार्थ का ही बोलबाला है। सरोवर में जब तक पानी भरा होता है तब तक हजारों मनुष्य, पशु-पक्षी यहां आते हैं परन्तु ज्योंकि वह सरोवर सूख जाता है त्योंहि सभी व्यक्ति उससे दूर चले जाते हैं। 

साध्वी डाॅ. दिव्यांजनाश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि संसार में प्रेम करते हैं धन से, संसार में प्रेम करते हैं पद से, संसार मंे प्रेम करते हैं शक्ति से, रूप से। यदि तुम्हारे पास धन है, पद है, रूप है, शक्ति है तो दुनिया तुमसे प्रेम करेगी, तुम्हारे प्रति सम्मान भाव दिखाऐगी। परन्तु यदि तुम्हारे पास इनमें से कुछ भी नहीं है तो तुम्हारे ही मित्र, स्वजन, सम्बन्धी तुमसे दूर-दूर रहेंगे। इसलिये तो भगवान महावीर ने कहा है स्वार्थमय संसार के सारे सम्बन्ध स्वार्थ से भरे हुए हैं। आज संसार में कई घटनाऐं ऐसी घट रही हैं जो मानव जाति के लिये कलंक हैं।

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