भारतीय संस्कृति का मूल आधार विनय है -मणिप्रभसागर
पालीताना, 27 जुलाई।
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर विश्व प्रसिद्ध जहाज मंदिर, गज मंदिर के अध्ािष्ठाता पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में सुखसागर प्रवचन पाण्डाल में विशाल ध्ार्मसभा को संबोध्ाित करते हुए कहा- विनय के अभाव में सुखमय जीवन जीने की कल्पना नहीं हो सकती । हर ध्ार्म का पहला पाठ विनय है । चाहे बौद्ध शास्त्र हो, चाहे जैन शास्त्र हो, चाहे सनातन शास्त्र हो, हर शास्त्र का प्रारंभ अपने अपने इष्ट देव के प्रति समर्पण भावों की अभिव्यक्ति के द्वारा ही होता है।
वे पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी महाराज की पावन प्रेरणा से बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा द्वारा आयोजित चातुर्मास अनुष्ठान पर्व के अन्तर्गत आराध्ाकों को उद्बोध्ान दे रहे थे।
उत्तराध्ययन सूत्र के आध्ाार पर प्रवचन फरमाते हुए उन्होंने कहा- भारतीय संस्कृति ठूंठ की तरह अकडना नहीं, बल्कि झुकना - नमना सिखाती है । यदि विनय की संस्कृति न हो तो जीवन में जहर घुल जायेगा । उन्होंने विस्तार से विवेचन करते हुए कहा- जीवन में हर पल अनुकूल अथवा प्रतिकूल घटनाऐं घटती रहती है ! कभी कोई दूसरे व्यक्ति से हमारे प्रति अनुचित व्यवहार हो जाता है । तो कभी हम किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अनुचित व्यवहार कर बैठते हैं । यदि इस प्रकार लगातार हो रहे या किये जा रहे अनुचित व्यवहारों को हमेशा के लिये अपने मन में बिठाले तो जिन्दगी दुरूह हो जायगी । हमें अपने अनुचित व्यवहार के लिये विनय पूर्वक क्षमायाचना कर व्यवहार को सामान्य बनाना होता है तो किसी दूसरे के अनुचित व्यवहार को भुलाकर संबंध्ा सामान्य बनाने होते हैं । जिन्दगी जीने का यह रहस्य विनय की संस्कृति सिखाती है ।
उन्होंने वर्तमान के पारस्परिक संबंध्ाों की व्याख्या करते हुए कहा- वर्तमान में संबंध्ाों में आत्मीयता के स्थान पर स्वार्थ आ गया है । विनय भी यदि आत्मीयता का परिचायक न हो कर यदि स्वार्थ का परिणाम है तो वह विनय विनय नहीं है ! वह ध्ाोखा है ।
उन्होंने कहा- बिना विनय के हम ज्ञान पाने के अध्ािकारी नहीं बनते । रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा- मृत्युशय्या पर पडे रावण से जब कुछ विद्या प्राप्त करने के लिये भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को भेजा तो वे सिरहाने खडे हो गये । बार बार कहने पर भी रावण ने उनकी ओर देखा तक नहीं, विद्या देने की बात तो दूर रही । आखिर भगवान श्री राम के कहने पर अगली बार जब लक्ष्मण रावण के पाॅंव की ओर खडे होकर विनयपूर्वक विद्या प्रदान का निवेदन किया तब रावण ने उन्हें विद्या प्राप्त करने का अध्ािकारी समझा । और विद्यादान किया ।
उन्होंने कहा- जीवन भर जिनसे मीठास मिलने पर आनंद का अनुभव किया हो, कभी कभी उन हाथों से थोडी कडवाश भी मीठी ही लगनी चाहिये।
श्री जिन हरि विहार के अध्यक्ष संघवी विजयराज डोसी ने कहा- पूज्य उपाध्यायश्री की वाणी में अनूठा जादू है, इसलिये पालीताणा के आराध्ाक गण बडी संख्या में प्रवचन श्रवण करने के लिये पध्ाार रहे हैं।
दोपहर में पूज्य उपाध्यायश्री ने योगविंशिका व समाचारी शतक के आध्ाार पर वांचना दी। जबकि पूज्य मुनि श्री मनितप्रभसागरजी ने तत्वज्ञान की कक्षा ली व पूजनीया साध्वी डाॅ. श्री नीलांजनाश्रीजी म. ने ध्ार्म बिन्दु ग्रन्थ पर प्रवचन दिया।
पूज्यश्री के सानिध्य में विहरमान तप, शत्रुंजय तप व सिद्धि तप की विशिष्ट आराध्ाना के साथ साथ कई मासक्षमण तपस्या का आरंभ हुआ है। बाहर से पध्ाारे महानुभावों का अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर आयोजक बाबुलाल लूणिया, रायचंद दायमा, भैरूलाल लूणिया, केवलचंद बोहरा, पंकज बोहरा आदि बडी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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