धर्म से ही हमारा आत्मविकास संभव है- साध्वी प्रियरंजनाश्री
बाड़मेर।
थार नगरी बाड़मेर में चातुर्मासिक धर्म आराधना के दौरान स्थानीय श्री जिनकांतिसागरसूरि आराधना भवन में साध्वीवर्या श्री प्रियरंजनाश्रीजी म.सा. ने चातुर्मास के सातवें दिन साध्वी प्रियरंजनाश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि मनुष्य भव बड़ा ही दुर्लभ है। जब जीव अनेक गतियों की यात्रा कर महान् पुण्य का उपार्जन करता है तब जाकर मानव का चोला उसे प्राप्त होता है। दुर्लभ मानव भव प्राप्त कर भोगों में आसक्त बनना यानि भविष्य में दुर्गति का आरक्षण करवाने की तैयारी करना है। मनुष्य भव का 1-1 समय अत्यंत कीमती है और इसे हमें तप, जप, संयम, आराधना आदि के द्वारा सार्थक करना चाहिये। धर्म से ही हमारा आत्मविकास संभव है।
साध्वी प्रियदिव्यांजनाश्री ने अपने प्रवचन में जिन शासन की महिमा पर प्रकाश डाला। दुनिया में अनेक धर्म, अनेक पंथ हैं पर सभी धर्मों में जैन धर्म का अपना विशेष स्थान है। ‘अहिंसा परमो धर्मः’ यह जैन शासन का प्राण है। जैन शासन की अहिंसा अत्यंत ही सूक्ष्म है। जहां अन्य धर्म में अपने प्राणों की रक्षा के लिए दूसरों के प्राणों का घात करने में आपत्ति नहीं ली गई वहीं जैन धर्म में परमात्मा ने कहा कि व्यक्ति को अपने प्राणों का बलिदान देकर भी दूसरों के प्राणों की रक्षा करनी चाहिये। निःस्वार्थ भाव से गरीब बीमार व्यक्ति और निसहाय मूक प्राणियों की सेवा व सहायता करनी चाहिये। फलस्वरूप हम आज देखते हैं कि पूरे भारत भर की 16,000 गौशालाओं में 12,500 गौशालाऐं जैनों द्वारा संचालित है। जिन शासन का मतलब सभी जीवों का कल्याण हो।
नमस्कार महामंत्री में व्यक्तिगत किसी को नमस्कार नहीं है, गुणों को नमस्कार किया गया है।
जिन शासन में नमो नमो की धुन से आराधना भवन मधुर कंठों से गूंजने लगा। भगवान महावीर स्वामी आज से 250 वर्ष पूर्व हुए थे। उन्होनें शासन की स्थापना की थी जाति वर्ण का भेदभाव कभी भी जिन शासन में नहीं रहा तभी तो गौतम स्वामी ब्राह्मण परिवार से होने पर भी उन्हें अपने जिन शासन में दीक्षित किया तथा सर्वप्रथम शिष्यों में उन्हें स्थान दिया।
जिन शासन में त्याग, तप, दया को श्रेष्ठ बताया है तथा संयम जीवन, मर्यादा पूर्वक जीवन को महत्वपूर्ण स्थान दिया। जिन शासन में महान् पुरूषों में कुमारपाल राजा, वस्तुपाल, तेजपाल जैसे दानवीर व्यक्ति हुए हैं। उन्हीं से भारत भूमि अपने आपको गौरवमयी मानती है।
चातुर्मासिक आराधना की कड़ी में प्रथम रविवारीय शिविर में साध्वीश्री ने बच्चों को उद्बोधन देते हुए कहा कि प्रभु के दर्शन, वंदन, पूजन करने से नीच गौत्र का नाश होता है तथा दर्शन वंदन से विनय विवेक प्राप्त होता है।
प्रथम दिवस शिविर में बच्चों एवं बच्चियों की उपस्थिति लगभग 500-600 की रही। साध्वीश्री के समझाने से सर्व बच्चों ने होटल का त्याग तथा जमीकंद का त्याग करने का प्रत्याख्यान किया।
आज रविवार को छोटे-छोटे 400 बच्चों ने एकासन का व्रत लिया। साध्वीश्री ने बच्चों में प्रवचन के बाद हाउजी गेम का आयोजन भी रखा। उस हाउजी गेम में सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।शिविर में शिक्षा देते हुए कहा कि घर में मम्मी, पापा व बड़ों का आदर सत्कार व सम्मान करना चाहिये।बिना कारण पानी का अपव्यय नहीं होना चाहिये। जितना पानी का कम उपयोग करेंगे, उतना पर्यावरण अच्छा रहेगा।
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