भारत को सौंपा सरबजीत का शव 
नई दिल्ली। 
पाकिस्तान ने गुरूवार को सरबजीत का शव भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया। जिन्ना अस्पताल में सरबजीत का पोस्टमार्टम किया गया। करीब एक हफ्ते से लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती सरबजीत ने बुधवार देर रात अस्पताल में दम तोड़ दिया था।
गौरतलब है कि दिल्ली से एक विशेष विमान लाहौर के लिए भेजा गया है। यह विमान उनके पार्थिव शरीर को अमृतसर लेकर आएगा,उसके बाद सरबजीत के पैतृक गांव भिखीविंड ले जाया जाएगा जहां पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार होगा। इधर,पंजाब सरकार ने घोषणा की है कि सरबजीत के शव का फिर से पोस्टमार्टम कराया जाएगा,ताकि वास्तविकता सामने आ सके।

जरदारी के पुतले फूंके -

सरबजीत की मौत से गुस्साए लोगों ने कोलकाता में प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के पुतले फूंके।
पाक ने दिए न्यायिक जांच के आदेश- 
पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के कार्यवाहक मुख्यमंत्री नजम सेठी ने कोट लखपत जेल में कैद भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की मौत की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। सरबजीत पर 26 अप्रैल को लाहौर की कोटलखपत जेल में कुछ कै दियों ने ईटो और धारदार हथियारों से प्राणघातक हमला किया था जिसके बाद उसे मरणासन्न हालत में लाहौर के जिन्ना अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सरबजीत को डाक्टरों ने बुधवार देर रात मृत घोषित किया। सेठी ने गुरूवार को यहां जारी अपने आदेश में सरबजीत की मौत से जुड़े प्रत्येक पहलू की जांच के निर्देश दिए हैं। बताया जा रहा है कि सरबजीत सिंह की मौत ब्रेन हेमरेज से हुई है। 


सरबजीत नॉन रिवर्सिबल कोमा में चले गए थे। सरबजीत की तबीयत में जब सुधार नहीं हो रहा था तो परिजन और भारत सरकार लगातार पाकिस्तान से अपील करते रहे कि उसे इलाज के लिए भारत या किसी अन्य देश भेज दिया जाए लेकिन उसने एक नहीं सुनी। पाकिस्तान इस बात पर अड़ा रहा कि इलाज वहीं होगा। पाकिस्तान की इसी जिद ने उनकी जान ले ली। 


आरोपी रिजवान और आमिर के खिलाफ हत्या की कोशिश का केस दर्ज किया गया था। सरबजीत सिंह को 1990 में लाहौर और फैसलाबाद में हुए बम धमाकों का दोषी करार दिया गया था। 1991 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। 

28 अगस्त 1990 को सरबजीत गलती से पाकिस्तान की सीमा में चले गए थे। पाकिस्तानी रेंजर्स ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के आठ दिन बाद पुलिस ने उन पर लाहौर और फैसलाबाद में हुए बम धमाकों का आरोप लगाया। 1990 से ही वह लाहौर की कोट लखपत जेल में कैद थे। 1991 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। कई बार उनकी फांसी टल गई। उनकी ओर से पांच दया याचिकाएं दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरबजीत की फांसी की सजा को बरकरार रखा। 

मार्च 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी की सजा पर पुर्नविचार के लिए दाखिल याचिका खारिज कर दी थी। मामले पर सुनवाई के दौरान उनके वकील कोर्ट में पेश नहीं हुए इसलिए याचिका खारिज कर दी गई। 3 मार्च 2008 को तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने उनकी दया याचिका खारिज कर दी। 26 जून 2012 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने सरबजीत को रिहा करने का फैसला किया लेकिन कुछ घंटे बाद ही अपना फैसला बदल लिया क्योंकि जमात ए इस्लामी और जमात उद दावा ने कड़ा एतराज जताया था। पाकिस्तान की सरकार ने सफाई दी कि सरबजीत नहीं बल्कि सुरजीत सिंह को रिहा किया जा रहा है।

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