दिल और दिमाग खाली रखें, हर तरह की बीमारियों से बचें

- डॉ. दीपक आचार्य
जीवन में हर प्रकार का सुकून पाने के लिए ताजगी के साथ ही ताजगी भरे माहौल की जरूरत स्वयंसिद्ध है। जहाँ ताजी हवा, शुद्ध आबोहवा और निर्मल परिवेश होता है वहाँ तमाम प्रकार की ताजगी हमेशा बनी रहती है।
इसके विपरीत जहाँ गंदगी के कतरे होते हैं या गंदगी भरा माहौल पसरा हुआ रहता है वहाँ सड़ांध और बीमारियों की भरमार बनी रहती है। आज हममें से काफी संख्या में लोग किसी न किसी रूप में बीमार हैं। कोई मानसिक बीमार है तो कोई शारीरिक बीमार।
कोई न कोई बीमारी हो ही नहीं, ऎसे बिरले लोग आजकल बहुत कम देखने को मिलते हैं। इन तमाम प्रकार की मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों के होते हुए भी हम ऊपर से निरोगी होने का भ्रम रखा करते हैं और स्वस्थ एवं मस्त बताने के लिए जाने कौन-कौन से जतन करने लगते हैंं। ब्यूटी पॉर्लरों से लेकर मसाज सेंटरों तक हमारी भागदौड़, कॉस्मेटिक्स का अंधाधुंध प्रयोग और जाने किस-किस किसम के सौन्दर्य प्रसाधन यंत्रों, उपकरणों और सामग्री का इस्तेमाल हम करते रहे हैं।
सभी प्रकार के बाहरी उपायों को लगातार करते रहते हुए हम अपने आपको तरोताजा बनाए रखने के भ्रमों को हमेशा जिन्दा रहने देते हैं। हमारी मानसिक और शारीरिक बीमारियों के लिए और कोई नहीं बल्कि हम ही जिम्मेदार हैं, इस सत्य को आज नहीं तो कल स्वीकार करना ही पड़ेगा।
हर जैसे आए थे वैसे ही निर्मल, निश्चिंत और मस्त रह नहीं पा रहे हैं बल्कि हमने धरा पर जन्म लेने के बाद जमाने भर का सब कुछ अपनी झोली में भर लेने या जमाने भर को पा लेने की गरज से जो कुछ किया होता है उसी का परिणाम है कि जमाने भर की गंदगी और वैचारिक धुंध तथा कल्पनाओं के महलों ने हमारे दिल और दिमाग को पूरी तरह जकड़ लिया है और हम रात-दिन उसी न उसी विचारों में खोये रहने लगे हैं कि हम अपना घर कैसे भरें, सब कुछ हमें कैसे मिल जाए,क्या-क्या जतन या षड़यंत्र हम करते रहें ताकि हमें वो सब कुछ प्राप्त हो जाए जो हमारी कल्पनाओं में है अथवा हमारी इच्छाओं के पिटारे में नज़रबंद है।
हमारे मन-मस्तिष्क में आने वाले विचार अपने साथ पूरा आभामण्डल लेकर आते हैं और इन विचारों या कल्पनाओं के साथ इतनी सारी सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियां लगी हुई रहती हैं कि इन्हें नापा नहीं जा सकता।
फिर यदि हम नकारात्मक धाराओं की ओर रुख कर लेते हैं तब इन सभी प्रकार के विचारों और कल्पनाओं से जुड़े नकारात्मक भाव सक्रिय होकर जेहन में अंकुरित होने शुरू हो जाते हैं जिनका स्थूल प्रभाव हमें सबसे पहले दिमाग में होने वाली असामयिक एवं अनमनी हलचल के रूप में अनुभवित होता है।
इस समय पर वह स्थूल रूप लेना ग्रहण करने ही लगता है। इसे यदि अनुभव कर सकारात्मक तत्वों का चिंतन करते हुए उसी समय समूलोच्छेदन कर लिया जाए तो वह स्थूल रूप नहीं ले पाकर वहीं नष्ट हो जाता है और ऎसे में यह फिर कभी आकार नहीं ले पाता है।
लेकिन मस्तिष्क की हलचलों की किसी न किसी कारण से उपेक्षा कर दी जाए तब यह मस्तिष्क की दीवारों से होकर हृदय तथा इसके बाद पूरे शरीर में कहीं न कहीं अपना ठिकाना ढूँढ़ता है अथवा बना लेता है।
इसके लिए यह अतिरिक्त स्थान ले लेता है जो चर्बी के रूप में उभार ला देता है। एक बार इसका शरीर में ठिकाना हो जाने के बाद यह धीरे-धीरे शरीर की नियमित और नियंत्रण प्रणाली पर दबे पांव हमला बोलने लगता है ।
वास्तव में देखा जाए तो बीमारियों का सूक्ष्म स्वरूप हमारे मन में उमड़ने-घुमड़ने वाली शंकाओं, आशंकाओं और असुरक्षा बोध से भरे नकारात्मक विचारों से ही पैदा होता है। इसके अलावा अपने काम के अलावा की बातें और अनावश्यक विचारों, कल्पनाओं और फालतू की चर्चाओं से मन-मस्तिष्क में प्रदूषण फैलता रहता है जो चुपचाप नहीं पड़ा रहता बल्कि पूरे शरीर में अपना प्रसार और प्रभुत्व चाहता है इसलिए ये नकारात्मकता के बीज अंकुरित होने लगते हैं और फिर शरीर के कोमल अंगों मस्तिष्क, नाड़ी तंत्र, हृदय, लीवर, किड़नी आदि पर इनका हमला शुरू हो जाता है और इससे जुड़ी बीमारियों का प्रभाव आरंभ हो जाता है।
सभी प्रकार की बीमारियों से बचने के लिए यह जरूरी है कि मन-मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के अनावश्यक विचार, असुरक्षा की भावना, आशंकाएं, भ्रम और शंकाओं आदि को टिकने न दें और उन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ ही नष्ट कर दें।
ऎसा कर देने मात्र से ही संसार भर की तमाम बीमारियों से बचा जा सकता है। जो लोग जमाने भर की चर्चाओं, फालतू की बातों और वैचारिक प्रदूषणों से घिरे रहने के आदी हो जाते हैं उन्हीं लोगों को बीमारियां ज्यादा घेरने लगती हैं।
कुछ अपवादोें को छोड़ दिया जाए तो दुनिया की अनावश्यक चर्चाओं और बातों या विचारों में रुचि लेने वाले और नास्तिक लोगों को ही बीमारियां ज्यादा होती हैं। इसका कारण यह है कि पूजा-पाठ और साधना, ध्यान करने वाले लोग रोजाना किसी न किसी समय में शांत चित्त और शून्य होने लगते हैं और ऎसे में उनके मस्तिष्क और शरीर की शक्तियों का पुनर्भरण अपने आप हो जाता है जो उन्हें बीमारियों से बचाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।
जिन लोगों को जीवन भर स्वस्थ और मस्त रहना है उन्हें चाहिए कि फालतू की झंझटों में न पड़ें और अपने काम से मतलब रखें। बेकार के विचारों और चर्चाओं में किसी भी सीमा तक रस न लें और ज्यादा से ज्यादा समय स्व कार्य, चिंतन और मनन में लगाएं ताकि मन और मस्तिष्क तथा शरीर को पूरी तरह ऊर्जित और ताजगी से परिपूर्ण रखा जा सके।

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