भारत के महान सपूत पंडित मोतीलाल नेहरू
अनिता महेचा
भारत को आजाद करवाने में जिन नेताओं की विशष्ट भूमिका रही है उनमे से एक है पंडित मोतीलाल नेहरू । आपका जन्म 6 मई, 1861 को आगरा में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित गंगाधर था । पिता का स्वर्गवास इनके पैदा होने से पूर्व ही हो गया था । सम्पन्न परिवार मे जन्मे पंडित मोतीलाल नेहरू का पालन पोषण इनके बड़े भाई पं. नंदलाल ने किया जो उस समय खेतड़ी के राज्य परिवार में दीवान पद पर कार्यरत थें ।
पं.मोतीलाल नेहरू बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे । सन 1880 में इन्होंने इन्ट्रेंस की परीक्षा कानपुर से उत्तीर्ण की । इस परीक्षा में वे प्रथम स्थान पर रहे । सन 1882 में इलाहबाद के म्योर सैन्ट्रल कॉलेज से एफ.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की । इसके बाद वकालत की परीक्षा के आप टोपर रहे पं. मोतीलाल नेहरू का विवाह स्वरूप रानी के साथ हुआ था । आप एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे । गौरारंग ,ऊँचा कद, हष्टपुष्ट शरीर और सुंदर मुख को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता था । उन्होंने कानपुर से वकालत प्रारम्भ की । इसके तीन साल बाद इलाहबाद हाईकोर्ट में वकालत करने लगें । यंहा वकालत ऐसी चमकी कि वे वर्ष पर्यन्त में एक लाख रूपये की कमाई करने लगें। विगत 14 नवम्बर 1889 को उनके पुत्र जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ।
वे हर काम शानदार तरीके से करते थे । वे अच्छे रहन सहन पर विश्वास रखते थें । शानोशोैकत व ठाट बाट से रहना उन्हे पसंद था । इलाहबाद में उनके द्वारा निर्मित करवाया गया आनंद भवन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इस भवन में उनके जन्म दिवस पर दी जाने वाली पार्टी तथा अन्य अवसरो पर दी जाने वाली पार्टियों की चर्चा सारे इलाहबाद में रहती थी । इनके घर की अलमारिया मखमल ,शाटन,और सिफान के विदेशों से मंगवाये गये कपड़ों से भरी रहती थी । ये कपड़े बहुत ही महंगे तो होते ही थे,उनके रंग भी बड़े सुहावने होते थे । घर में 50 नौकर ,अस्तबल में 22 घोड़े व 18 कुत्ते थें जिनमें कुछ शिकारी तथा कुछ पहरा देने वाले थे।
उल्लेखनीय है कि 1892 में इलाहबाद में कांग्रेस का एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में स्वागत समिति के आप पदाधिकारी रहे। इसके पश्चात सात वर्ष तक आप प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। सन 1909 में उन्होंने ’’ इंडिपेन्डेन्ट ’’ नामक समाचारपत्र निकाला। पं. मोतीलाल जी पर महात्मागांधी का काफी असर पड़ा। राजसी ठाठबाट छोड़ कर वे देश सेवा में जूट गए।
असहयोग आंदोलन में अपनी लाखों की वकालत को ठोकर मारकर पूर्ण रूप से आन्दोलन में कूद पडे। 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन जलियावाला बाग का हत्याकांड हुआ । जिसे ब्रिटिश शासन के इतिहास का सबसे क्रूर अत्याचार कहा जाता हैं । उस दिन कांग्रेस पार्टी ने जलियावाला बाग में एक सभा आयोजित की थी । इस सभा में तकरीबन 20 हजार लोग उपस्थित थें । जिनमें स्ति्रयां ,पुरूष, बू़े बच्चे शामिल थें । ब्रिटिश सैनिको ने इस शांतिपूर्ण भीड़ के बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर उनपर गोलियां दागी गई थी । उनकी नरम राजनिति ने पहली गरमाहट महसूस की । इस घटना ने पं.मोतीलाल को हिलाकर रख दिया । इस कांड ने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया । उसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ताकत नई दिशा प्रदान की । जो आंदोलन केवल पॄेलिखे बुद्धिजीवियों तक सीमित था , वहीं अब सम्पूर्ण देश में हर वर्ग में फैल गया। वे कांग्रेस में शामिल हो गऐ । दिसम्बर 1919 को पं मोतीलाल नेहरू कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गऐ । इसके बाद वे जेल भी गए।
अब इनका पूरा परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा । इलाहबाद स्थित उनका निवास स्थान आनंद भवन देश के मुक्ति आंदोलन का केन्द्र बन गया । पं मोतीलाल देश के नामी वकील थे ओर वकालत में उन्होने कीर्ति व ऐश्वर्य दोनो हासिल किये थे अब वे दुगने उत्साह के साथ राष्ट्र सेवा में लग गऐ ।
सन 1921 में इंगलेण्ड के युवाराज भारत में आए । पं मोतीलाल ने उनकी यात्रा का बहिष्कार करवाया। जिस मोतीलाल के लिऐ लेप्टिनेंट गर्वनर सर हारकोर्ट बटलर के राजभवन के द्वार खुले रहते थे। उसी पं मोतीलाल को बेटे जवाहरलाल के साथ जेल के काले सीखचो वाले द्वार में बंद कर दिया । 7 दिसम्बर 1921 को जब नैनी जेल में मुकदमा पेश हुआ तो आदलत ने बाप बेटे दोनो को छः छः महिने की कैद व 500सौ रूपये जुर्माने की सजा सुनाई ।
1927 में पं मोतीलाल को एक मुकदमे के सिलसिले में विलायत जाना पड़ा । वहां से लौटते समय आप ने रूस की यात्रा की । देश में विलायती की बनी वस्तुओं का बहिष्कार किया जा रहा था । आपने सारे ऐश्वर्य को ठोकरमारकर सादा जीवन व्यतीत करने का प्रण लिया । विधानसभा की सदस्यता को त्याग दिया । अपनी बेटी कृष्णा को स्कूल से हटा दिया । घर की गाड़ियां ,मूल्यवान चायना क्रोकरी,शराब की बोतले,घोड़े सब हटा दिये । नौकरों की तादाद कम कर दी बेशकिमती व किमखाब ,मलमल,तनजेब,जार्जेट व जरी के हजारो रूपये के कपड़ो की होली घर के छत पर जलाई । सारा परिवार हाथ के काते व बुने मोटे खदर के कपड़े पहनने लगा । मोतीलाल जी को पुनः जेल में डाल दिया गया ।
बार बार में जेल जाने से आपका स्वास्थ्य बिगड़ गया । अक्सर आप बुखार से पीड़ित रहने लगे । फेफड़ो में सूजन आ गई । दमे की बीमारी ने भी घर कर लिया । उन दिनों जवाहरलाल नेहरू भी जेल में थे इनकी बीमारी की बजह से उन्हे जेल से रिहा कर दिया गया । वे पं मोतीलालजी को इलाज के लिए लखनउ ले गए । पर वहां भी कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पाया और लखनऊ में उनका देहांत 6 फरवरी 1931 को हुआ । उनका पार्थिव शरीर लखनऊ से इलाहबाद लाया गया ।
भारत का यह ज्योति पूंूज अपनी ज्योति से सारे भारत को आलोकित करता रहा । आज पंडित मोतीलाल हमारे बीच मौजूद नहीं है। पर उनके आदशर हमारा पथ निर्देश करते रहेगें , हम उनके द्वारा बताये पथ चल कर देश का गौरव बा सकें , यही कामना है।
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