क्यों न रद्द कर दी जाए नियुक्ति? 
जयपुर।
state newsहाईकोर्ट ने राज्य मंत्री का दर्जा देकर बनाए गए 13 संसदीय सचिवों से पूछा है कि उनकी नियुक्ति से मंत्रिपरिषद सदस्यों की संख्या 30 से अघिक हो जाती है, ऎसे में क्यों न नियुक्ति रद्द कर दी जाए? नोटिस मंत्रिमण्डल सचिवालय के प्रमुख सचिव के जरिए तामील कराने का आदेश देते हुए संसदीय सचिवों से दस दिन में जवाब मांगा है। उधर, राज्य सरकार ने संसदीय सचिवों की नियुक्ति को जायज बताते हुए कहा कि ये मंत्री की परिभाषा में नहीं आते हैं।
न्यायाधीश आरएस राठौड़ ने शुक्रवार को विधायक कालीचरण सराफ, राजपाल सिंह शेखावत एवं अशोक परनामी की याचिका पर सुनवाई की। प्रार्थीपक्ष के वकील राजदीपक रस्तोगी ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि कुल विधानसभा सदस्यों के अघिकतम 15 फीसदी ही मंत्री बन सकते हैं, लेकिन मौजूदा राज्य सरकार में मुख्यमंत्री सहित 27 मंत्री और 13 संसदीय सचिव हैं। इन्हें राज्य मंत्री का दर्जा है, ऎसे में मंत्रिपरिषद की संख्या 40 होने से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है। संसदीय सचिवों की नियुक्ति को रद्द किया जाए।
यह भी कहा याचिका में
संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत राज्य में अघिकतम 30 मंत्री हो सकते हैं, लेकिन सरकार की वेबसाइट पर संसदीय सचिव मंत्री परिषद की सूची में हैं। इनको राज्यमंत्री के समान सुविधा, अघिकार व स्टाफ मुहैया कराने से जनता पर भार पड़ रहा है।
ये हैं संसदीय सचिव
दिलीप चौधरी, ब्रह्मदेव कुमावत व नानालाल निनामा, रामकेश मीना, रमेश मीना व गिर्राज सिंह मलिंगा, गजेन्द्र सिंह शक्तावत, जयदीप डूडी, कन्हैया लाल झंवर, ममता भूपेश, राजेन्द्र सिंह विधूड़ी, रामस्वरूप कसाना व जाहिदा खान।
ये कहा राज्य सरकार ने 
महाघिवक्ता जीएस बापना के जरिए राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब में कहा कि संसदीय सचिव मंत्री नहीं हैं, केवल उन्हें काम करने में सहुलियत के लिए मंत्री का दर्जा दिया है। राज्य सरकार इन्हें मंत्री नहीं बनाना चाहती, ये केवल मंत्रियों को सहयोग करने के लिए हैं और इसी प्रकार का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। भाजपा सरकार के समय भी संसदीय सचिव थे और तीनों विधायक इस नियुक्ति से प्रभावित भी नहीं हैं, ऎसे में इन्हें नियुक्ति को चुनौती देने का अघिकार नहीं है।

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

 
HAFTE KI BAAT © 2013-14. All Rights Reserved.
Top