मूवी रिव्यू: 'ब्लड मनी'
विशाल ठाकुर फिल्म के क्लाईमेक्स का एक सीन.. विलेन जावेरी (मनीष चौधरी) के सामने बैठा हीरो यानी कुणाल (कुणाल खेमू) कहता है, ‘अबे चुप, यह क्या कहानी सुना रहा है। ऐसा तो अस्सी की फिल्मों में हुआ करता था। आज की बात कर।’ फिल्म के हीरो का यह पंच फिल्म की असली स्टोरी लाइन पर बिलकुल फिट बैठता है। बेशक ऐसी कहानी तो अस्सी के दशक में भुनाई जाती थी। अस्सी ही क्यों? नब्बे के दशक में भी ऐसी कहानियों की भरमार थी। और मौजूदा दौर में इमरान हाशमी का नाम लें तो वह ‘ब्लड मनी’ सरीखी कई फिल्में कर चुके हैं। वह भी महेश भट्ट कैंप के साथ ही। बावजूद इसके भट्ट कैंप से ही ऐसी फिल्म का निकलना हैरान करता है।फिल्म की कहानी का ज्यादा गुणगान और बखान न किया जाए तो यह केवल दो किरदारों के इर्द-गिर्द ही घूमती दिखाई देती है। इंटरवल से पहले की कहानी जावेरी और कुणाल के बीच नौकरी के दौरान होने वाले लेन-देन को दर्शाती है और बाद में दोनों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल शुरू हो जाता है।
बुरे दिनों से गुजर चुके कुणाल को साउथ अफ्रीका में एक अच्छी नौकरी मिल जाती है। वह अपनी बीवी आरजू (अमृता पुरी) के साथ वहां जाता है। वह यह देख कर हैरान रह जाता है कि कंपनी ने उसे आलीशान मकान और गाड़ी के साथ-साथ सेलरी के तौर पर बड़ी रकम ऑफर की है। जल्द ही कुणाल अपने बॉस जावेरी की आंखों में चढ़ जाता है, जो जावेरी के भाई को नहीं सुहाता। कुणाल की व्यस्तता बढ़ने लगती है। तो उधर आरजू से दूरियां भी। दोनों के बीच आए दिन झगड़े होने लगते हैं। इसी दौरान कुणाल को पता चलता है कि जावेरी डायमंड बेचने की आड़ में माफिया और आतंकवादियों से सांठ-गांठ रखता है।
ये सब जानने के बावजूद कुणाल उसके साथ काम करता रहता है। एक दिन जावेरी का भाई दिनेश ऑफिस की पार्टी के बाद कुणाल और उसके साथ काम करने वाली लड़की की अश्लील फोटो खींच लेता है और उसे ब्लैकमेल करने लगता है। तभी ऑफिस में काम करने वाले शान की मौत भी हो जाती है। कुणाल को शक होता है कि शान को जावेरी ने मरवाया है। कुणाल को कहीं से सुराग मिलता है कि जावेरी की सारी गुप्त जानकारी एक ब्लैक डायरी और उसके कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क में मौजूद है। वह इन चीजों को हथियाने के लिए जावेरी के ऑफिस की छानबीन करता है। उसे वो चीजें मिल जाती हैं, लेकिन जावेरी का तो प्लान ही कुछ और होता है।
साउथ अफ्रीका की खूबसूरत लोकेशंस में फिल्म की शुरुआत काफी खूबसूरत लगती है, लेकिन इंटरवल तक आते-आते बाकी की कहानी के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होता। इस कहानी में अगर डायमंड ट्रेड की जगह माफिया फिट कर दिया जाए तो यह अस्सी-नब्बे के दशक में बुनी गई सैकड़ों फिल्मों की कहानियों जैसी लगती। इसलिए कहानी के स्तर पर दर्शकों का फिल्म से बंधना मुश्किल है। इसके अलावा कुणाल खेमू की एक्टिंग में भी ऐसी कोई खास बात नहीं दिखती, जिससे दर्शक बंधे रहें। कुछेक सीन्स में वह जमते हैं, लेकिन ऐसे सीन्स काफी छोटे हैं।
जावेरी और कुणाल के बीच इटैलियन रेस्तरां वाला सीन अच्छा है। उस दौरान हुई डायलॉगबाजी भी अच्छी है। इसी तरह कुणाल और अमृता पुरी के बीच पहली बार नए घर में होने वाले संवाद अच्छे हैं। लेकिन फिल्म के क्लाईमेक्स में अमृता पुरी का एक संवाद बेहद बचकाना लगता है, जिसमें वह कहती है, ‘कुणाल तुम्हें मेरे साथ मुंबई जाना होगा, क्योंकि मैं विधवा बन कर अकेले मुंबई नहीं जाना चाहती।’ अभिनय के स्तर पर फिल्म में बांधने का काम मनीष चौधरी ने किया है। ‘रॉकेट सिंह : सेल्समैन ऑफ द इयर’ से डेब्यू करने वाले मनीष ने एक तेज-तर्रार बॉस का किरदार बखूबी निभाया है। डिजाइनर रॉबटरे कवाली के व्हाइट्स (सिर से पांव तक पहनी गई सभी चीजें व्हाइट में) को उन्होंने एक सीन में बेहद अच्छे से कैरी किया है। कुल मिला कर ब्लड मनी एक औसत से हल्की फिल्म है।

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